सहयोग पोर्टल और कंटेंट हटाने के आदेशों को चुनौती: कर्नाटक हाइकोर्ट ने केंद्र सरकार को जारी किया नोटिस
Amir Ahmad
10 March 2026 4:04 PM IST

कर्नाटक हाइकोर्ट ने सोशल मीडिया मंच एक्स कॉर्प की याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया।
बता दें, यह याचिका उस फैसले के खिलाफ दायर की गई, जिसमें अदालत की एकल पीठ ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) की धारा 79(3)(बी) के तहत अधिकारियों को 'सहयोग पोर्टल' के माध्यम से आपत्तिजनक सामग्री हटाने के निर्देश देने का अधिकार मान्य ठहराया था।
चीफ जस्टिस विभू बाखरू और जस्टिस सी. पूनाचा की खंडपीठ ने अपील को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई 11 जून को होगी।
दरअसल, हाइकोर्ट की एकल पीठ के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने 24 सितंबर, 2025 को 351 पृष्ठों का विस्तृत फैसला सुनाते हुए यह माना था कि केवल IT Act की धारा 69ए के तहत ही नहीं, बल्कि धारा 79(3)(बी) के तहत भी सरकार या उसके अधिकृत अधिकारी सोशल मीडिया प्लेटफार्म को अवैध सामग्री हटाने के निर्देश दे सकते हैं।
अदालत ने उस समय यह भी कहा कि सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 के नियम 3(1)(डी) के साथ पढ़े जाने पर धारा 79(3)(बी) अधिकारियों को यह अधिकार देती है कि वे मध्यस्थ मंचों से अवैध सामग्री हटाने को कह सकें। यदि ऐसा करने में प्लेटफॉर्म असफल रहते हैं तो उन्हें धारा 79 के तहत मिलने वाली 'सेफ हार्बर' सुरक्षा खोनी पड़ सकती है।
IT Act की धारा 79 के तहत इंटरनेट सेवा प्रदाताओं और डिजिटल मंचों को तीसरे पक्ष की सामग्री के लिए सीमित दायित्व से छूट दी गई, जिसे सामान्यतः 'सेफ हार्बर' संरक्षण कहा जाता है।
हालांकि एक्स कॉर्प ने अपनी अपील में तर्क दिया कि सामग्री को ब्लॉक करने या हटाने के आदेश केवल धारा 69ए के तहत ही जारी किए जा सकते हैं, क्योंकि उसी प्रावधान में आवश्यक कानूनी सुरक्षा और प्रक्रिया निर्धारित है। कंपनी का कहना है कि केवल इसी धारा के तहत नियुक्त अधिकारी को ऐसा आदेश देने का अधिकार होना चाहिए।
कंपनी की ओर से सीनियर एडवोकेट के.जी. राघवन ने दलील दी कि धारा 79 को कंटेंट हटाने के आदेश जारी करने की स्वतंत्र शक्ति के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। उनके अनुसार धारा 69ए और धारा 79 को साथ पढ़ा जाना चाहिए।
एक्स कॉर्प ने यह भी तर्क दिया कि सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2021 का नियम 3(1)(डी) कई प्रशासनिक अधिकारियों को बिना पर्याप्त नियंत्रण के कंटेंट हटाने के आदेश देने की शक्ति दे देता है, जिससे मनमाने सेंसरशिप का खतरा पैदा हो सकता है।
कंपनी ने अपने तर्क में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ का हवाला देते हुए कहा कि उस फैसले में मध्यस्थ मंचों की जिम्मेदारी सीमित करते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सुरक्षा सुनिश्चित की गई।
वहीं एकल पीठ ने अपने पहले के फैसले में कहा कि नियम 3(1)(डी) संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाया गया एक उचित प्रतिबंध है।
अदालत ने यह भी कहा कि विदेशी कंपनियां अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का दावा नहीं कर सकतीं।
अब खंडपीठ ने मामले को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और अगली सुनवाई 11 जून को निर्धारित की।

