डी.के. शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाए जाने के खिलाफ याचिका खारिज, कर्नाटक ने कहा- 'सिर्फ प्रचार पाने की कोशिश, लगाया 50 हजार का जुर्माना
Amir Ahmad
16 Jun 2026 6:23 PM IST

कर्नाटक हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में गठित मंत्रिपरिषद की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज की।
अदालत ने याचिका को प्रचार पाने की कोशिश और न्यायपालिका के समय का अनुचित उपयोग बताते हुए याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।
चीफ जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने मंगलप्पा हुलिकेरी नामक याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी याचिका संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) की गलत व्याख्या पर आधारित है।
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि कर्नाटक विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के कम से कम 12 प्रतिशत मंत्रियों का होना अनिवार्य है। इसी आधार पर उसने 14 सदस्यीय मंत्रिपरिषद को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि संविधान का प्रावधान स्पष्ट है।
अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 164(1ए) के अनुसार मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती, जबकि न्यूनतम संख्या 12 मंत्रियों की होनी चाहिए।
अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने संविधान के प्रावधान को गलत तरीके से पढ़ा और इसी गलत धारणा पर पूरी याचिका दायर की गई।
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा,
“यह याचिका केवल प्रचार प्राप्त करने के उद्देश्य से दायर की गई प्रतीत होती है। साथ ही न्यायपालिका के बहुमूल्य समय का अनुचित उपयोग है।”
सुनवाई के दौरान जब अदालत ने याचिका की कमजोरियों की ओर संकेत किया तो याचिकाकर्ता ने मौखिक रूप से याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह अनुरोध भी ठुकरा दिया और कहा कि इस तरह की निराधार याचिकाओं में ऐसी छूट नहीं दी जा सकती।
अदालत ने याचिका खारिज करते हुए 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया और निर्देश दिया कि यह राशि दो सप्ताह के भीतर कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण में जमा कराई जाए।
गौरतलब है कि 3 जून 2026 को गठित कर्नाटक मंत्रिपरिषद में मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार और उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर सहित कुल 14 मंत्री शामिल हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह संख्या संविधान के अनुरूप है और मंत्रिपरिषद के गठन में कोई संवैधानिक त्रुटि नहीं है।

