महात्मा गांधी की हत्या जांच में देरी पर दायर याचिका खारिज: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा- न्यायिक समय का दुरुपयोग नहीं हो सकता

Amir Ahmad

8 Jun 2026 7:40 PM IST

  • महात्मा गांधी की हत्या जांच में देरी पर दायर याचिका खारिज: कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा- न्यायिक समय का दुरुपयोग नहीं हो सकता

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने महात्मा गांधी की हत्या की जांच में कथित 17 वर्ष की देरी, उनकी आत्मकथा के एक कथित लापता खंड और अन्य ऐतिहासिक मुद्दों की जांच की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज की। अदालत ने याचिकाकर्ता पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया।

    चीफ जस्टिस विभु बाखरू और जस्टिस के. एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा,

    "इसमें न राष्ट्रीय हित है और न ही जनहित। ऐसे मनमाने मामलों में न्यायालय का समय इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।"

    याचिका जागृत कर्नाटक, जागृत भारत' नामक संगठन की ओर से दायर की गई। संगठन के अध्यक्ष के. एन. मंजूनाथ ने स्वयं अदालत में पक्ष रखा।

    याचिका में मांग की गई कि महात्मा गांधी की 1948 में हुई हत्या की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित करने में 17 वर्ष की देरी के कारणों की जांच कराई जाए। साथ ही उनकी आत्मकथा के कथित रूप से लापता दूसरे खंड की खोज और 1947 में तत्कालीन ब्रिटिश वायसराय को लिखे गए एक पत्र से जुड़े मुद्दों की भी जांच कराने का अनुरोध किया गया।

    याचिकाकर्ता ने यह भी मांग की थी कि संसद की संयुक्त समिति गठित कर यह पता लगाया जाए कि हत्या के बाद तत्काल जांच आयोग क्यों नहीं बनाया गया और वर्ष 1965 में ही आयोग गठित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।

    इसके अलावा याचिका में दावा किया गया कि महात्मा गांधी की आत्मकथा का दूसरा खंड लापता है और उससे संबंधित दस्तावेज कथित रूप से कुछ अभिलेखीय बक्सों में मौजूद हो सकते हैं। एक अन्य मांग गांधी के संयुक्त राष्ट्र को लिखे गए कथित पत्र से संबंधित थी, जिसके बारे में याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह गुम हो गया या बदल दिया गया।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यही याचिकाकर्ता पहले भी इसी तरह की याचिका दायर कर चुका है, जिसे अगस्त 2025 में खारिज कर दिया गया। उस समय भी अदालत ने पाया कि याचिका में लगाए गए आरोपों और मांगों के समर्थन में पर्याप्त सामग्री नहीं थी।

    खंडपीठ ने कहा कि वर्तमान याचिका भी जनहित में राहत पाने के बजाय प्रचार हासिल करने का प्रयास प्रतीत होती है।

    आदेश में कहा गया,

    "हम इस याचिका पर विचार करने के लिए तैयार नहीं हैं।"

    अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता अपने स्तर पर ऐतिहासिक शोध कर सकता है, लेकिन न्यायालय ऐसे दस्तावेजों के खुलासे या खोज के आदेश नहीं दे सकता जिनके अस्तित्व का कोई ठोस आधार उपलब्ध न हो।

    हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए 10 हजार रुपये का जुर्माना कर्नाटक राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण के पास दो सप्ताह के भीतर जमा कराने का निर्देश दिया।

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