साहिबगंज में समानांतर प्रशासन चलने पर चिंता, पहाड़िया समुदाय की सुरक्षा के आदेश: झारखंड हाइकोर्ट

Amir Ahmad

2 Feb 2026 4:37 PM IST

  • साहिबगंज में समानांतर प्रशासन चलने पर चिंता, पहाड़िया समुदाय की सुरक्षा के आदेश: झारखंड हाइकोर्ट

    झारखंड हाइकोर्ट ने साहिबगंज जिले में पहाड़िया आदिवासी समुदाय के कथित सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के गंभीर आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस और जिला प्रशासन को समुदाय के संवैधानिक और वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। हाइकोर्ट ने कहा कि किसी भी समूह को राज्य के अधिकार अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    यह आदेश जस्टिस संजय प्रसाद की एकल पीठ ने उस आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें तीन अपीलकर्ताओं ने अग्रिम जमानत की मांग की थी। अपीलकर्ता बारहरवा थाना कांड संख्या 79/2025 में गिरफ्तारी की आशंका जता रहे थे। यह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) की गंभीर धाराओं के तहत दर्ज किया गया।

    FIR के अनुसार सूचक और पहाड़िया समुदाय के 17–18 लोग होली का त्योहार मना रहे थे तभी मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग लाठी-डंडों के साथ वहां पहुंचे और कथित तौर पर जबरन संगीत बंद करा दिया। आरोप है कि उन्होंने संख्या बल का हवाला देते हुए पहाड़िया समुदाय के लोगों को त्योहार मनाने से रोका और धमकाया। जब सूचक ने इसका विरोध किया तो एक सह-आरोपी द्वारा जातिसूचक गालियां देने, मारपीट करने और महिला की मर्यादा भंग करने का भी आरोप लगाया गया।

    FIR में यह भी गंभीर आरोप लगाए गए कि आरोपियों ने दुकानदारों को पहाड़िया समुदाय को राशन न देने, डॉक्टरों को इलाज न करने और सरकारी नलों से पानी लेने से रोकने के निर्देश दिए। इतना ही नहीं, सरकारी कुएं में ईंट-पत्थर डालकर उसे नष्ट कर दिया गया, जिससे समुदाय को भोजन, पानी और मेडिकल जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित कर दिया गया।

    अग्रिम जमानत की मांग करते हुए अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उनके नाम FIR में नहीं हैं और बाद में आपसी रंजिश के कारण उन्हें फंसाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि विवाद का आपसी समझौते से निपटारा हो चुका है। इस संबंध में संयुक्त समझौता याचिका भी दाखिल की गई, जिसे सूचक का समर्थन प्राप्त है।

    राज्य सरकार की ओर से इस याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि भले ही अपीलकर्ताओं के नाम FIR में न हों, लेकिन केस डायरी से उनकी संलिप्तता स्पष्ट होती है। पहाड़िया समुदाय के कई गवाहों ने बयान दिए कि अपीलकर्ता राशन, इलाज, रोजगार और सरकारी जल स्रोतों तक पहुंच रोकने में शामिल थे। अभियोजन के अनुसार, समुदाय पर सामूहिक रूप से सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार थोपने के निर्देश दिए गए।

    मामले की सामग्री और केस डायरी का अवलोकन करने के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि साहिबगंज में कुछ लोग जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल हैं, प्रभावी रूप से समानांतर प्रशासन चला रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि पहाड़िया समुदाय को न केवल होली मनाने से रोका गया, बल्कि उन्हें भोजन, पानी, चिकित्सा, शिक्षा और अन्य बुनियादी जरूरतों से भी व्यवस्थित रूप से वंचित किया गया।

    हाइकोर्ट ने इसे संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का घोर उल्लंघन बताया। कोर्ट ने पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर असंतोष जताते हुए कहा कि जांच अधिकारी और सीनियर पुलिस अधिकारियों ने घोर लापरवाही बरती है। एफआईआर दर्ज होने के करीब दस महीने बाद भी किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न होना साहिबगंज जिले की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

    कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सूचक और उसका समुदाय अपने ही जिले में अल्पसंख्यक जैसी स्थिति में आ गए हैं और प्रभावी प्रशासनिक संरक्षण के अभाव में उन्हें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में किया गया समझौता भी सराहनीय नहीं है।

    इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने अपीलकर्ताओं की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी और पुलिस तथा जिला प्रशासन को निर्देश दिया कि वे पहाड़िया समुदाय की सुरक्षा सुनिश्चित करें और उनके मौलिक अधिकारों के किसी भी प्रकार के उल्लंघन को तत्काल रोकें।

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