हिरासत में 437 मौतों पर झारखंड हाइकोर्ट सख्त, मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य, राज्य से मांगी विस्तृत रिपोर्ट
Amir Ahmad
19 Feb 2026 2:30 PM IST

झारखंड हाइकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176(1-क) (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196) के तहत पुलिस या न्यायिक हिरासत में मृत्यु, लापता होने या दुष्कर्म के हर मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा न्यायिक जांच अनिवार्य है। अदालत ने राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत जानकारी मांगी, क्योंकि राज्य ने खुलासा किया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच 437 लोगों की हिरासत में मौत हुई।
चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मांग की गई कि हिरासत में मृत्यु लापता होने या दुष्कर्म के सभी मामलों में न्यायिक जांच की वैधानिक अनिवार्यता का पालन सुनिश्चित किया जाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने गृह कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग की प्रधान सचिव वंदना दादेल द्वारा दायर शपथपत्र का उल्लेख किया। शपथपत्र के साथ तालिका संलग्न थी, जिसमें बताया गया कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच 437 व्यक्तियों की पुलिस या न्यायिक हिरासत में मृत्यु हुई। हालांकि तालिका में यह उल्लेख था कि मृत्यु की सूचना मजिस्ट्रेट को दी गई या नहीं लेकिन अधिकांश मामलों में यह स्पष्ट नहीं था कि धारा 176(1-क) के तहत अनिवार्य न्यायिक जांच वास्तव में कराई गई या नहीं।
अदालत ने कहा कि यह मामला काफी समय से लंबित है और पहले भी राज्य को कई अवसर दिए जा चुके हैं कि वह वैधानिक प्रावधानों के अनुपालन से संबंधित पूरी जानकारी शपथपत्र के माध्यम से दे।
प्रावधान के उद्देश्य पर जोर देते हुए पीठ ने कहा कि धारा 176(1-क) स्पष्ट रूप से यह अनिवार्य करती है कि पुलिस जांच के अतिरिक्त, संबंधित क्षेत्राधिकार के न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा स्वतंत्र न्यायिक जांच भी की जाए ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
“इन 437 मौतों के संबंध में क्या न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा कोई जांच की गई, यह जानकारी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए हम झारखंड सरकार के गृह सचिव को निर्देश देते हैं कि वे इस संबंध में शपथपत्र दाखिल करें। यदि पुलिस जांच के अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा कोई जांच नहीं कराई गई तो ऐसे मामलों का विवरण भी शपथपत्र में दिया जाए। शपथपत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों के अनुपालन की स्थिति भी स्पष्ट की जाए क्योंकि उपलब्ध आंकड़ों में वर्ष 2023 से 2025 तक की हिरासत मौतें भी शामिल हैं।”
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि राज्य द्वारा दायर किए जाने वाले शपथपत्र में यह स्पष्ट किया जाए कि हिरासत में मौत के मामलों में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया या नहीं।
खंडपीठ ने कहा कि वर्तमान शपथपत्र और तालिका से यह स्पष्ट नहीं है कि मृत्यु के कारण का निर्धारण केवल पुलिस अधिकारियों द्वारा किया गया या कानून के तहत अनिवार्य स्वतंत्र न्यायिक जांच भी कराई गई। अदालत ने कहा कि हिरासत में बड़ी संख्या में हुई मौतों को देखते हुए यह आवश्यक है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी तरह की गड़बड़ी की आशंका को समाप्त करने के लिए बनाए गए वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं।
अदालत ने झारखंड सरकार के गृह सचिव को 13 मार्च, 2026 तक विस्तृत और समग्र शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को निर्धारित की गई।

