झारखंड हाइकोर्ट ने दिवंगत कर्मी के वारिसों को दिया पूर्ण बकाया वेतन, कहा- निष्पक्ष जांच के बाद भी लेबर कोर्ट सजा में बदलाव कर सकता है

Amir Ahmad

3 March 2026 3:10 PM IST

  • झारखंड हाइकोर्ट ने दिवंगत कर्मी के वारिसों को दिया पूर्ण बकाया वेतन, कहा- निष्पक्ष जांच के बाद भी लेबर कोर्ट सजा में बदलाव कर सकता है

    झारखंड हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही विभागीय जांच निष्पक्ष और विधिसम्मत पाई गई हो, फिर भी लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को यह परखने का अधिकार है कि दी गई सजा अपराध की गंभीरता के अनुपात में है या नहीं। औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की धारा 11ए के तहत वह उचित राहत प्रदान कर सकता है।

    जस्टिस दीपक रोशन की एकलपीठ प्रबंधन द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 15 जनवरी 2008 के लेबर कोर्ट के अवार्ड को चुनौती दी गई। लेबर कोर्ट ने कर्मचारी की बर्खास्तगी निरस्त करते हुए पुनर्नियुक्ति, 40 प्रतिशत बकाया वेतन तथा अन्य परिणामी लाभ देने का आदेश दिया था और सेवा निरंतर मानी थी।

    प्रकरण के तथ्य

    कर्मचारी सी.के. सिंह (कार्यवाही के दौरान निधन) 14 जुलाई 1969 से कंपनी में कार्यरत थे। फरवरी 1983 में उनका ऑपरेशन हुआ। उनका आरोप था कि टांका अंदर रह जाने से संक्रमण और तीव्र पीड़ा हुई। 22 फरवरी 1983 को जब वे अस्पताल में भर्ती होने पहुंचे तो कथित रूप से डॉक्टर ने मना कर दिया। दर्द की अवस्था में उन्होंने आपत्ति जताई, जिसके बाद डॉक्टर ने उनके विरुद्ध अभद्र भाषा और धमकी देने की शिकायत की।

    इस आधार पर आरोपपत्र जारी हुआ और विभागीय जांच के बाद 18 जून 1984 से सेवा से अलग कर दिया गया।

    हाइकोर्ट का विश्लेषण

    हाइकोर्ट ने कहा कि धारा 11ए के बाद लेबर कोर्ट केवल जांच की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि सजा की अनुपातिकता की भी समीक्षा कर सकता है। अदालत ने वर्कमेन बनाम फायरस्टोन टायर एंड रबर कंपनी और महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड बनाम एन.बी. नरावड़े के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायाधिकरण यह देख सकता है कि क्या सजा अत्यधिक है, क्या कोई शमनकारी परिस्थितियां हैं और कर्मचारी का पूर्व आचरण कैसा रहा है।

    अदालत ने माना कि यहां शमनकारी परिस्थितियां स्पष्ट थीं। कर्मचारी को नियोक्ता के ही अस्पताल में उपचार के दौरान संक्रमण हुआ। दर्द की स्थिति में कथित शब्द कहे गए। शिकायतकर्ता डॉक्टर और अन्य डॉक्टर के बयानों में भी विरोधाभास था। अदालत ने कहा कि किसी भी मरीज का दर्द में प्रतिक्रिया देना अस्वाभाविक नहीं है, विशेषकर जब उसे उपचार से वंचित कर वापस भेज दिया गया हो।

    अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि मामला किसी सीनियर अधिकारी का होता तो मेडिकल लापरवाही पर डॉक्टर के विरुद्ध कार्रवाई होती और मुआवजा भी मिलता। दुर्भाग्य से यहां कर्मचारी को न केवल पीड़ा झेलनी पड़ी, बल्कि नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा।

    अंतिम आदेश

    मामले की लंबी न्यायिक प्रक्रिया और कर्मचारी के निधन को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने आदेश दिया कि कर्मचारी के विधिक उत्तराधिकारियों को अवार्ड की तिथि से मृत्यु या सेवानिवृत्ति (जो भी पहले हो) तक का पूर्ण वेतन, सभी परिणामी लाभ, वेतन संशोधन और भत्ते दिए जाएं। इस प्रकार प्रबंधन की याचिका खारिज कर लेबर कोर्ट के अधिकार और विवेकाधिकार बरकरार रखा गया।

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