समझौते की शर्तों के उल्लंघन मात्र से जमानत रद्द नहीं की जा सकती: झारखंड हाईकोर्ट

Amir Ahmad

9 Jan 2026 7:04 PM IST

  • समझौते की शर्तों के उल्लंघन मात्र से जमानत रद्द नहीं की जा सकती: झारखंड हाईकोर्ट

    झारखंड हाईकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि एक बार जमानत दिए जाने के बाद केवल समझौते की शर्तों का पालन न करना या भुगतान करने के वादे को पूरा न कर पाना, अपने आप में जमानत रद्द करने का आधार नहीं बन सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने के लिए इससे कहीं अधिक ठोस और कानूनी आधार आवश्यक होता है।

    यह टिप्पणी जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की सिंगल बेंच ने उस मामले में की, जिसमें याचिकाकर्ता ने न्यायिक आयुक्त, रांची द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी। उक्त आदेश के जरिए याचिकाकर्ता को पहले से मिली अग्रिम जमानत को यह कहते हुए रद्द कर दिया गया कि उसने विपक्षी पक्ष के साथ हुए समझौते की शर्तों का उल्लंघन किया।

    मामले के अनुसार. याचिकाकर्ता को 28 जून 2022 को अग्रिम जमानत प्रदान की गई। बाद में न्यायिक आयुक्त, रांची ने यह पाते हुए कि याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी नंबर-2 के साथ किए गए समझौते के तहत भुगतान का वादा पूरा नहीं किया, केवल इसी आधार पर उसकी अग्रिम जमानत रद्द कर दी।

    हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट केवल इस आधार पर अग्रिम जमानत रद्द नहीं कर सकती थी कि भुगतान का वादा पूरा नहीं किया गया। यह तर्क दिया गया कि समझौते की शर्तों का उल्लंघन, जब तक कि वह जमानत की शर्तों से सीधे तौर पर जुड़ा न हो या न्याय प्रक्रिया को प्रभावित न करता हो, जमानत रद्द करने का वैध आधार नहीं हो सकता।

    वहीं, राज्य की ओर से यह कहा गया कि चूंकि जमानत समझौते के आधार पर दी गई और याचिकाकर्ता ने उन्हीं शर्तों का उल्लंघन किया, इसलिए ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं है।

    मामले पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह विधि का स्थापित सिद्धांत है कि किसी समझौते की शर्तों का पालन न करना या भुगतान करने में विफल रहना मात्र जमानत रद्द करने का आधार नहीं बनता। अदालत ने पाया कि न्यायिक आयुक्त द्वारा जमानत रद्द करने का एकमात्र आधार पक्षकारों के बीच मध्यस्थता केंद्र में हुआ समझौता था, जिसके उल्लंघन का आरोप लगाया गया।

    हाईकोर्ट ने इस संदर्भ में मध्यस्थता अधिनियम, 2023 की धारा 22 का हवाला दिया, जो मध्यस्थता प्रक्रिया की गोपनीयता सुनिश्चित करती है। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान पक्षकारों को किसी भी न्यायालय या कार्यवाही में मध्यस्थता से जुड़ी किसी भी बातचीत, प्रस्ताव की स्वीकृति या अन्य संचार को साक्ष्य के रूप में पेश करने से रोकता है।

    इन परिस्थितियों में अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि न्यायिक आयुक्त, रांची द्वारा पारित आदेश कानूनन टिकाऊ नहीं है। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने विवादित आदेश को निरस्त कर दिया और याचिकाकर्ता को दी गई अग्रिम जमानत को बहाल कर दिया।

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