427 हिरासत मौतों पर झारखंड हाईकोर्ट सख्त, कहा- कानून की खुली अवहेलना, न्यायिक जांच के दिए आदेश
Amir Ahmad
16 May 2026 12:35 PM IST

झारखंड में हिरासत में हुई मौतों के मामलों पर झारखंड हाईकोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य द्वारा पेश किए गए आंकड़े “शब्दों से परे झकझोर देने वाले” हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2018 से अब तक राज्य में 427 लोगों की पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत हुई, लेकिन बड़ी संख्या में मामलों में कानून के स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद न्यायिक जांच नहीं कराई गई।
चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मांग की गई कि हिरासत में मौत, गायब होने या दुष्कर्म के हर मामले में अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट से जांच कराई जाए।
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि झारखंड विधानसभा में सरकार की ओर से दिए गए जवाब के अनुसार वर्ष 2019 से 2021 के बीच 166 लोगों की हिरासत में मौत हुई। इसके बावजूद, दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176(1-ए) के तहत अनिवार्य न्यायिक जांच कराने के बजाय कई मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों से जांच कराई गई।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के हलफनामे पर गंभीर नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार खुद स्वीकार कर रही है कि 427 मामलों में से 262 जांचें कार्यपालक मजिस्ट्रेटों ने कीं, जबकि कानून ने दो दशक पहले ही उनसे यह अधिकार वापस ले लिया था।
अदालत ने कहा,
“हिरासत में किसी व्यक्ति की मौत राज्य व्यवस्था की गंभीर विफलता है। कानून के शासन वाले सभ्य समाज में हिरासत में हिंसा न्याय की मूल भावना पर सीधा प्रहार है।”
खंडपीठ ने साफ कहा कि CrPC की धारा 176(1-ए) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196(2) केवल औपचारिक प्रावधान नहीं, बल्कि बाध्यकारी कानूनी आदेश हैं। अदालत ने कहा कि कानून में “शैल” शब्द का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि ऐसी जांच केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट ही करेंगे, इसमें किसी प्रकार का विकल्प नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा,
“राज्य सरकार को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह अपनी सुविधा से तय करे कि किस मामले की जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट करेंगे और किसकी कार्यपालक मजिस्ट्रेट।”
अदालत ने राज्य सरकार के आंकड़ों में गंभीर विसंगति भी पाई। सरकार ने बताया कि 262 जांचें कार्यपालक मजिस्ट्रेटों और 225 जांचें न्यायिक मजिस्ट्रेटों ने कीं। यानी कुल 487 जांचें, जबकि हिरासत में मौतों की संख्या 427 बताई गई। अदालत ने कहा कि यह स्थिति सरकारी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है और कानून के प्रति संस्थागत उदासीनता को दिखाती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि हिरासत में हुई अस्वाभाविक मौतों में मुआवजा केवल दीवानी राहत नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राज्य की विफलता पर संवैधानिक उपचार का हिस्सा है।
अदालत ने निर्देश दिया कि वर्ष 2018 से अब तक जिन मामलों में कार्यपालक मजिस्ट्रेटों ने जांच की, उनकी जिला-वार सूची तैयार की जाए। संबंधित प्रधान जिला एवं सत्र जज 15 दिनों के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट नामित करेंगे और जांच यथासंभव छह महीने में पूरी की जाएगी।
साथ ही हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि भविष्य में हिरासत में मौत, गायब होने या दुष्कर्म की हर घटना की सूचना 24 घंटे के भीतर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, राज्य मानवाधिकार आयोग और संबंधित प्रधान जिला जज को दी जाए। प्रधान जिला जज 48 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त करेंगे और जांच सामान्यतः दो महीने में पूरी होगी।
अदालत ने झारखंड न्यायिक अकादमी के निदेशक को भी चार महीने के भीतर जांच रिपोर्ट के लिए मानक प्रक्रिया और प्रारूप तैयार करने का निर्देश दिया।

