नियुक्ति पत्र की तारीख निर्णायक, जॉइनिंग की तारीख नहीं: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट

Amir Ahmad

16 Jan 2026 4:11 PM IST

  • नियुक्ति पत्र की तारीख निर्णायक, जॉइनिंग की तारीख नहीं: हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट

    हिमाचल प्रदेश हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतन निर्धारण से जुड़े लाभ तय करने के लिए नियुक्ति पत्र की तारीख निर्णायक होगी, न कि कर्मचारी के सेवा जॉइन करने की तारीख।

    हाइकोर्ट ने कहा कि यदि नियुक्ति पत्र नियमों में संशोधन से पहले जारी हो चुका है तो बाद में जॉइन करने के आधार पर कर्मचारी को उसके वैध अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

    यह अहम फैसला जस्टिस संदीप शर्मा ने पूर्व सैनिक संजीव कुमार की याचिका पर सुनाया।

    अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता का अपनी पूरी स्वीकृत सैन्य सेवा को वेतन निर्धारण के लिए गिनवाने का अधिकार केवल इस आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता कि उन्होंने सिविल सेवा नियमों में संशोधन लागू होने के बाद कार्यभार ग्रहण किया।

    जस्टिस संदीप शर्मा ने अपने आदेश में कहा,

    “याचिकाकर्ता द्वारा सिविल सेवा में आने से पहले दी गई पूरी सैन्य सेवा को गिनने का वैध अधिकार इस आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता कि उसने 29.01.2018 के बाद जॉइन किया।”

    मामले के अनुसार, संजीव कुमार ने भारतीय सशस्त्र बलों में 15 वर्ष से अधिक की स्वीकृत सैन्य सेवा दी थी।

    इसके बाद उन्होंने वर्ष 2017 में पूर्व सैनिक कोटे के तहत हिमाचल प्रदेश स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक में जूनियर क्लर्क पद के लिए प्रतियोगी परीक्षा दी और सफल हुए।

    याचिकाकर्ता को सितंबर, 2017 में नियुक्ति पत्र जारी किया गया। हालांकि, उस समय वह अभी भी सशस्त्र बलों में कार्यरत थे, जिसके कारण वह तत्काल बैंक में जॉइन नहीं कर सके। बैंक ने उनकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए जॉइनिंग की तारीख बढ़ाकर फरवरी 2018 कर दी।

    फरवरी 2018 में सेवा जॉइन करने के बाद संजीव कुमार ने अपनी पूरी सैन्य सेवा को वेतन निर्धारण में शामिल करने की मांग की। लेकिन बैंक प्रबंधन ने यह कहते हुए उनका दावा खारिज कर दिया कि 29 जनवरी 2018 को नियम 5(1) में संशोधन हो चुका था, जिसके तहत केवल न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता प्राप्त करने के बाद की सेवा को ही गिना जा सकता है।

    हाइकोर्ट ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि जब नियुक्ति पत्र संशोधन से पहले जारी हो चुका था और जॉइनिंग में देरी नियोक्ता की अनुमति से हुई तो संशोधित नियमों के आधार पर लाभ से वंचित करना अनुचित है।

    अदालत ने खारिजी आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की पूरी स्वीकृत सैन्य सेवा को वेतन निर्धारण के लिए गिना जाए और वर्ष 1972 के नियमों में किए गए संशोधन को उनके मामले में लागू न किया जाए।

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