DGP के पास शिकायत भेजना पर्याप्त नहीं, पहले थाने के प्रभारी अधिकारी से संपर्क जरूरी: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
5 Jun 2026 2:57 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी संज्ञेय अपराध की शिकायत में सीधे पुलिस महानिदेशक (DGP) के पास जाने को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPc) की धारा 154(1) का पालन नहीं माना जा सकता। शिकायतकर्ता को सबसे पहले संबंधित थाने के प्रभारी अधिकारी के समक्ष सूचना देनी होगी तभी वह मजिस्ट्रेट के समक्ष जांच के लिए आवेदन कर सकता है।
जस्टिस राकेश कैंथला ने इस आधार पर एक FIR और मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, नाहन द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने कानून द्वारा निर्धारित प्रारंभिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया था।
मामला सिरमौर जिले की 232-14 बीघा भूमि से जुड़े विवाद का है। शिकायतकर्ता संजीव कुमार शर्मा का दावा था कि भूमि के मालिकों ने वर्ष 2004 में उसके पक्ष में बिक्री का समझौता किया था और उसने लगभग 1.49 करोड़ रुपये का भुगतान भी कर दिया था। उसके अनुसार भूमि का कब्जा भी उसे सौंप दिया गया लेकिन बाद में शेष भूमि की रजिस्ट्री नहीं की गई।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि वर्ष 2024 में आरोपित पक्ष कुछ लोगों के साथ भूमि पर पहुंचा और उसे तथा उसके मजदूरों को धमकाया।
इस संबंध में उसने स्थानीय पुलिस के बजाय सीधे पुलिस महानिदेशक को शिकायत भेजी। शिकायत आगे पुलिस अधीक्षक को जांच के लिए भेजी गई लेकिन FIR दर्ज नहीं हुई।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दायर किया जिस पर मजिस्ट्रेट ने FIR दर्ज कर जांच के आदेश दे दिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वयं यह तर्क दिया कि आरोपित सत्तारूढ़ दल से जुड़े हैं। इसलिए उसने स्थानीय पुलिस की बजाय सीधे DGP से संपर्क किया। हालांकि, यह कानूनन पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा,
"जब शिकायत थाने के प्रभारी अधिकारी को न देकर किसी अन्य अधिकारी को दी जाती है, तो धारा 154(1) का पालन नहीं माना जा सकता और ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता सीधे मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 156(3) के तहत नहीं जा सकता।"
पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय बाध्यकारी है और इसी आधार पर मजिस्ट्रेट का आदेश तथा उसके बाद दर्ज FIR टिक नहीं सकती।
अदालत ने स्पष्ट किया कि FIR को केवल तकनीकी आधार पर रद्द किया गया। इसलिए शिकायतकर्ता के लिए कानूनी रास्ता बंद नहीं हुआ है। यदि वह पहले संबंधित थाने के प्रभारी अधिकारी के समक्ष शिकायत देकर कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करता है, तो उसके बाद वह दोबारा मजिस्ट्रेट का दरवाजा खटखटा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की जा रही है और शिकायतकर्ता कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहेगा।

