धार्मिक भावनाओं की आड़ में सार्वजनिक रास्ता नहीं रोका जा सकता: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट, मंदिर का अवैध गेट हटाने का आदेश
Amir Ahmad
1 Aug 2026 3:58 PM IST

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि धार्मिक भावनाओं के नाम पर सार्वजनिक रास्ते पर अवैध कब्जा या बाधा पैदा नहीं की जा सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि "धर्म का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया को कमजोर करने के औजार के रूप में नहीं किया जा सकता।" इसी के साथ हाईकोर्ट ने सरकारी भूमि पर मंदिर जाने वाले रास्ते पर लगाए गए अनधिकृत लोहे के गेट को हटाने का आदेश दिया।
जस्टिस ज्योत्सना रेवाल दुआ ने कहा कि कोई भी व्यक्ति धार्मिक हितों की रक्षा के नाम पर कानून अपने हाथ में नहीं ले सकता, खासकर तब जब इससे किसी अन्य व्यक्ति के अपनी संपत्ति तक पहुंचने के अधिकार का उल्लंघन होता हो।
मामला सोलन जिले के मंडाला गांव का है। याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ विकास प्राधिकरण द्वारा सरकारी भूमि पर बनाए गए सार्वजनिक मार्ग पर एक व्यक्ति ने अवैध रूप से लोहे का गेट लगा दिया। यह रास्ता शिव मंदिर के साथ-साथ याचिकाकर्ता की जमीन तक भी जाता है। याचिका के अनुसार, मंदिर से करीब 300 मीटर पहले लगाया गया यह गेट अक्सर बंद रहता था, जिससे उसकी जमीन तक पहुंच बाधित होती थी।
शिकायत मिलने पर विकास प्राधिकरण ने हिमाचल प्रदेश नगर एवं ग्राम योजना अधिनियम, 1977 के तहत कार्रवाई करते हुए गेट को वहां से हटाकर मंदिर के पास लगाने का आदेश दिया था। हालांकि, बाद में यह आदेश वापस ले लिया गया, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पहले आपसी सहमति से विवाद सुलझाने का प्रयास करने की सलाह दी और कहा,
"किसी को भी धार्मिक भावनाएं आहत होने का बहाना बनाकर कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती। धर्म का इस्तेमाल कानूनी प्रक्रिया को विफल करने के साधन के रूप में नहीं होना चाहिए।"
कोर्ट के निर्देश पर सोलन के उपायुक्त की अध्यक्षता में गठित समिति ने मौके का निरीक्षण किया। समिति ने सुझाव दिया कि गेट की संरचना बनी रह सकती है, लेकिन उसके दरवाजे हटा दिए जाएं या उन्हें हमेशा खुला रखा जाए, ताकि आम लोगों का आवागमन बाधित न हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह निर्विवाद है कि संबंधित सड़क सरकारी भूमि पर बनी है और गेट बिना किसी वैध अनुमति के लगाया गया। कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता की संपत्ति मंदिर से पहले स्थित है और गेट के कारण उसे बार-बार अपनी जमीन तक पहुंचने में परेशानी हो रही थी।
कोर्ट ने माना कि विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी का पहले पारित आदेश, जिसमें गेट को वर्तमान स्थान से हटाकर मंदिर के निकट लगाने का निर्देश दिया गया, कानून के अनुरूप और न्यायसंगत था। इससे मंदिर की सुरक्षा संबंधी चिंताओं और याचिकाकर्ता के रास्ते के अधिकार, दोनों का संतुलन बना रहता।
इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए सरकारी भूमि पर लगाए गए अनधिकृत गेट को हटाने का आदेश दिया।


