आपसी सहमति से साथ रहने और अलग होने के लिखित समझौते से शादी के झूठे वादे पर रेप का आरोप साबित करना मुश्किल: गुजरात हाईकोर्ट

  • आपसी सहमति से साथ रहने और अलग होने के लिखित समझौते से शादी के झूठे वादे पर रेप का आरोप साबित करना मुश्किल: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि जब दो वयस्क आपसी सहमति से लिखित समझौते के तहत साथ रहते हैं। बाद में एक अन्य लिखित समझौते के जरिए अलग होने का फैसला करते हैं तो शादी के झूठे वादे के आधार पर रेप का आरोप साबित करना मुश्किल हो जाता है। हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी अपनी पूर्व लिव-इन पार्टनर से रेप के आरोपी व्यक्ति को ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए की।

    जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक चला संबंध, उनका साथ रहना और सहमति से शारीरिक संबंध बनाना तथा युवती के माता-पिता की जानकारी में अलग-अलग किराए के मकानों में रहना, इस धारणा को जन्म देता है कि उनका संबंध वैध सहमति पर आधारित है।

    अदालत ने कहा,

    “जब दो वयस्क कई महीनों तक ऐसे लिखित समझौते के तहत साथ रहते हैं, जिसमें स्वतंत्र सहमति दर्ज हो, और बाद में एक अन्य लिखित दस्तावेज के जरिए आपसी सहमति से उस व्यवस्था को समाप्त कर देते हैं, जिसमें दोबारा किसी दबाव या जबरदस्ती के अभाव की पुष्टि की गई हो, तो यह अभियोजन के उस दावे को बनाए रखना मुश्किल कर देता है कि पूरा संबंध शादी के झूठे वादे और बार-बार की गई जबरदस्ती का परिणाम था। भले ही कानूनन समझौते को रद्द करने के लिए ऐसा दस्तावेज बनाना अनिवार्य न हो, फिर भी यह इस निष्कर्ष का प्रत्यक्ष समर्थन करता है कि शारीरिक संबंध, जहां तक बने, शिकायतकर्ता की निरंतर सहमति पर आधारित थे और दोनों ने स्वेच्छा से अलग होने का निर्णय लिया।”

    हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि पहला लिखित समझौता करते समय आरोपी की उम्र 20 वर्ष थी और वह विवाह योग्य उम्र का नहीं था। यह समझौता तब तक लागू रहा, जब तक संबंध समाप्त होने पर दोनों पक्षों ने बाद में एक अन्य दस्तावेज के माध्यम से इसे रद्द नहीं कर दिया।

    अदालत ने कहा कि इस बीच की अवधि में शिकायतकर्ता महिला अपनी इच्छा और सहमति से आरोपी के साथ रही थी। किसी भी व्यक्ति, जिसमें आरोपी भी शामिल है, की ओर से बल या दबाव का इस्तेमाल किए जाने की बात स्थापित नहीं हुई। अदालत ने यह भी कहा कि इस प्रकार का समझौता सार्वजनिक नीति के विरुद्ध है।

    खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि यह माना भी जाए कि समझौता करते समय आरोपी 20 वर्ष का था और उसके बाद 21 वर्ष का हुआ, तब भी वह ऐसा समझौता नहीं कर सकता, जिसे कानूनन लागू कराया जा सके। समझौते का उद्देश्य यह था कि विवाह योग्य उम्र प्राप्त करने के बाद आरोपी शिकायतकर्ता से शादी करेगा।

    अदालत ने कहा कि विवाह करने की कानूनी पात्रता न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किए गए ऐसे वादे से संबंधित दस्तावेज का इस मुद्दे पर कोई साक्ष्यात्मक महत्व नहीं है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे दस्तावेज को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। यह सार्वजनिक नीति और कानून के भी विरुद्ध है तथा शिकायतकर्ता जिस तरीके से इसका इस्तेमाल करना चाहती है, उस तरह इसका उपयोग नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने कहा,

    “मौजूदा मामला ऐसा नहीं है, जिसमें शुरुआत से ही बेईमान मंशा के साथ शादी का वादा किया गया हो, ताकि उस वादे की आड़ में यौन संबंध बनाए जा सकें। यहां दोनों पक्षों ने आपसी सहमति से साथ रहने के लिए लिखित समझौता किया और बाद में एक अन्य दस्तावेज के जरिए उसे आपसी सहमति से समाप्त कर दिया। शिकायतकर्ता वयस्क थी और अपनी इच्छा से आरोपी के साथ रही। इसलिए इस मामले को शादी के झूठे वादे के आधार पर रेप की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।”

    हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच हुए समझौते का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय आरोपी की उम्र 20 वर्ष थी और वह विवाह योग्य उम्र तक नहीं पहुंचा। अदालत के अनुसार, दोनों ने किसी तीसरे व्यक्ति के दबाव या जबरदस्ती के बिना अपनी इच्छा से साथ रहने का निर्णय लिया।

    पहले समझौते में महिला ने घोषित किया कि वह अपनी इच्छा और आरोपी पर विश्वास रहने तक उसके साथ तथा उसके संरक्षण में रहेगी। उसने यह भी कहा कि उसे आरोपी के साथ रहने के लिए कोई लालच या प्रलोभन नहीं दिया गया और उसने दस्तावेज अपनी स्वतंत्र इच्छा से बनाया है। समझौते में यह भी दर्ज था कि दोनों अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वतंत्र रूप से लेंगे और आरोपी के 21 वर्ष की विवाह योग्य उम्र प्राप्त करने के बाद अपनी इच्छा और सहमति से शादी करेंगे। दोनों ने इस संबंध में सहमति जताई।

    इसके बाद 29 जनवरी 2020 को दोनों के बीच एक और समझौता हुआ। इसमें कहा गया कि दोनों अपनी पढ़ाई कर रहे थे और बिना किसी दबाव, धमकी या उत्पीड़न के अपनी इच्छा से अलग-अलग रहने का निर्णय ले रहे थे।

    हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों में बताई गई अवधि के अंत में तैयार किया गया यह दस्तावेज महत्वपूर्ण है। इसमें न तो मारपीट, न आत्महत्या की धमकी और न ही जबरन शारीरिक संबंध बनाने का कोई उल्लेख था। यह शिकायतकर्ता के पिता और चाचा के उन बयानों के अनुरूप था, जिनमें उन्होंने स्वीकार किया कि महिला अपनी इच्छा से आरोपी के पास गई और उसके साथ रही थी तथा बाद में समझौता रद्द कर दिया गया।

    अदालत ने यह भी कहा कि यदि दो मानसिक रूप से सक्षम वयस्क लंबे समय तक लिव-इन संबंध में रहते हैं और उनके बीच शारीरिक संबंध भी होते हैं, तो यह धारणा बन सकती है कि उन्होंने इस तरह के संबंध के परिणामों को समझते हुए स्वेच्छा से ऐसा रिश्ता चुना था।

    खंडपीठ ने कहा कि ऐसे हालात में शिकायतकर्ता का यह आरोप स्वीकार करना उचित नहीं है कि संबंध केवल इसलिए स्थापित हुआ क्योंकि आरोपी ने शादी का वादा किया। खासकर तब, जब यह आरोप ही नहीं है कि शादी का वादा न होता तो दोनों के बीच संबंध स्थापित नहीं होता। अदालत ने इस तथ्य पर भी ध्यान दिया कि लिव-इन संबंध का समझौता करते समय आरोपी विवाह योग्य उम्र का नहीं था।

    अदालत ने टिप्पणी की कि लंबे समय तक चलने वाले लिव-इन संबंध में कभी-कभी पक्षकार इस रिश्ते को शादी के बंधन में बदलने की इच्छा व्यक्त कर सकते हैं। लेकिन केवल ऐसी इच्छा जाहिर करने से यह साबित नहीं होता कि उनका पूरा संबंध उसी इच्छा या वादे का परिणाम था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि आज महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और अपने जीवन के बारे में स्वयं सोच-समझकर निर्णय लेने में सक्षम हैं। आर्थिक स्वतंत्रता सहित अन्य परिस्थितियों ने लिव-इन संबंधों के चलन को बढ़ाया है। इसलिए केवल किसी बात पर मतभेद या विवाद उत्पन्न होने से उसे आपराधिक मुकदमे का रूप नहीं दिया जा सकता।

    अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अत्यधिक तकनीकी या संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने के बजाय संबंध की अवधि और पक्षकारों के आचरण को ध्यान में रखना चाहिए। इन परिस्थितियों के आधार पर अदालत यह मान सकती है कि दोनों पक्षों ने ऐसे संबंध में रहने के लिए निहित सहमति दी थी, भले ही बाद में वे उस रिश्ते को विवाह में बदलना चाहते हों या नहीं।

    इन टिप्पणियों के साथ गुजरात हाईकोर्ट ने महिला की अपील खारिज की और आरोपी को बरी करने के ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा।

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