यूसुफ पठान को गुजरात हाईकोर्ट की फटकार, पूछा- आवंटन पूरा हुए बिना सरकारी भूखंड पर कब्जा कैसे किया?
Amir Ahmad
8 Jun 2026 6:41 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर और तृणमूल कांग्रेस सांसद यूसुफ पठान से तीखे सवाल पूछते हुए कहा कि आवंटन की सभी औपचारिकताएं पूरी हुए बिना किसी सरकारी भूखंड पर कब्जा कैसे किया जा सकता है?
अदालत ने संकेत दिया कि न केवल भूखंड खाली करने का निर्देश दिया जा सकता है, बल्कि सार्वजनिक भूमि के उपयोग और कब्जे के लिए हर्जाना भी लगाया जा सकता है।
चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डी. एन. राय की खंडपीठ यूसुफ पठान की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने अगस्त 2025 के एकल पीठ के आदेश को चुनौती दी।
सिंगल जज ने उन्हें वडोदरा की सरकारी जमीन पर अतिक्रमणकारी करार दिया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मामले में भूखंड के आवंटन का कोई अंतिम आदेश कभी जारी नहीं हुआ। केवल एक प्रस्ताव था, जिसे बाद में राज्य सरकार ने अस्वीकार कर दिया।
अदालत ने टिप्पणी की, "सार्वजनिक भूखंड पर बिना सभी औपचारिकताएं पूरी किए कब्जा करने वाले किसी भी व्यक्ति को राहत नहीं दी जा सकती।"
यूसुफ पठान की ओर से सीनियर एडवोकेट शालिन मेहता ने दलील दी कि 1999 की एक सरकारी नीति के तहत अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों को कुछ शर्तों पर भूखंड दिए जाने का प्रावधान है और यह दस्तावेज एकल पीठ के समक्ष नहीं रखा गया। उनका कहना था कि उनके मुवक्किल इस नीति के तहत पात्र हैं।
हालांकि, अदालत ने कहा कि वडोदरा नगर निगम की स्थायी समिति का प्रस्ताव मात्र पर्याप्त नहीं था, क्योंकि भूखंड का आवंटन सार्वजनिक नीलामी के बिना किया जाना था और इसके लिए राज्य सरकार की मंजूरी आवश्यक थी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने यूसुफ पठान के पक्ष से बार-बार पूछा,
"जब तक आवंटन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, तब तक आपने भूखंड पर कब्जा कैसे कर लिया? किस अधिकारी ने इसकी अनुमति दी? उनके नाम बताइए, हम जांच शुरू करेंगे।"
अदालत ने यह भी कहा कि किसी भी अचल संपत्ति का कब्जा तभी लिया जा सकता है जब सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी हो जाएं। केवल प्रस्ताव पारित हो जाने से किसी को भूमि पर अधिकार नहीं मिल जाता।
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने कहा कि किसी खिलाड़ी को केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का प्रतिनिधित्व करने के आधार पर संपत्ति पाने का मौलिक अधिकार नहीं मिल जाता। उन्होंने यह भी बताया कि यूसुफ पठान ने अब तक भूखंड के लिए कोई भुगतान नहीं किया।
इस पर अदालत ने कहा,
"आपने सार्वजनिक भूखंड की घेराबंदी कर दी। यह स्वयं में अतिक्रमण है और सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण एक आपराधिक कृत्य है।"
खंडपीठ ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक भूमि पर कब्जा बनाए रखता है, भले ही उसका उपयोग न कर रहा हो, तब भी वह हर्जाने का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी हो सकता है।
अदालत ने यूसुफ पठान के वकील से पूछा कि भूखंड खाली करने के लिए कितने समय की आवश्यकता होगी।
इस पर वकील ने निर्देश लेने के लिए समय मांगा। अदालत ने संकेत दिया कि वह दो सप्ताह से अधिक का समय देने के पक्ष में नहीं है।
मामले की अगली सुनवाई 15 जून को होगी।
अदालत ने स्पष्ट किया कि वह सार्वजनिक भूमि पर कथित कब्जे की अवधि के लिए बाजार दर के अनुसार हर्जाना लगाने के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है।
उल्लेखनीय है कि यूसुफ पठान ने वर्ष 2012 में भूखंड आवंटन के लिए आवेदन किया था। बाद में वडोदरा नगर निगम ने बिना नीलामी के 99 वर्ष की लीज पर भूखंड देने का प्रस्ताव भेजा था, जिसे राज्य सरकार ने 2024 में अस्वीकार कर दिया। इसके बाद जमीन से अतिक्रमण हटाने के निर्देश जारी किए गए।
सिंगल जज ने अपने आदेश में कहा था कि बिना भुगतान किए लंबे समय तक कब्जा बनाए रखने से किसी व्यक्ति को भूमि पर कोई अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता।
अदालत ने यह भी कहा था कि चर्चित व्यक्तित्व समाज के लिए आदर्श माने जाते हैं और कानून के पालन में उन्हें विशेष छूट देना समाज को गलत संदेश देगा।

