शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाना गंभीर आरोप, मां की असहमति बहाना नहीं: गुजरात हाईकोर्ट
Amir Ahmad
21 May 2026 11:29 AM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत दर्ज FIR रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि शादी से इनकार करने के लिए केवल यह कहना कि “मां रिश्ते के लिए तैयार नहीं थीं”, प्रथम दृष्टया दुर्भावनापूर्ण मंशा को दर्शाता है।
जस्टिस एम. के. ठक्कर ने जाम्बिया निवासी आरोपी की याचिका खारिज करते हुए कहा कि मामले के आरोप यह संकेत देते हैं कि आरोपी ने विवाह का झूठा आश्वासन देकर पीड़िता के साथ शारीरिक संबंध बनाए, जबकि उसकी शादी करने की वास्तविक मंशा नहीं थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा,
“सिर्फ यह कहना कि मां शादी के लिए तैयार नहीं थीं इसे प्रामाणिक कारण नहीं माना जा सकता। यदि आरोपी वास्तव में शादी करना चाहता था, तो संबंध बनाने से पहले उसे अपनी मां की राय लेनी चाहिए थी। बाद में शादी से इनकार करना दुर्भावनापूर्ण मंशा को दर्शाता है।”
मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी उसे होटल ले गया और शादी का वादा कर शारीरिक संबंध बनाए। आरोपी ने दिसंबर 2024 में शादी का भरोसा दिया था लेकिन जनवरी 2025 में यह कहते हुए शादी से इनकार कर दिया कि उसकी मां इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि FIR के अनुसार आरोपी फरवरी 2022 से फरवरी 2024 तक पीड़िता के संपर्क में रहा और शादी का आश्वासन देता रहा।
अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया यह मामला केवल शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए झूठा वादा करने का प्रतीत होता है।
आरोपी ने अदालत में दावा किया कि उसका और पीड़िता का संबंध आपसी सहमति और विश्वास पर आधारित था। उसने यह भी कहा कि वह पीड़िता और उसके परिवार के संपर्क में था तथा उसने आर्थिक सहायता के रूप में 40 हजार रुपये भेजे थे। इसके अलावा उसने मोबाइल फोन और कपड़े भी भेजे थे।
आरोपी की ओर से यह भी दलील दी गई कि प्राथमिकी कथित घटना के करीब पांच महीने बाद दर्ज कराई गई, जिससे आरोपों की सत्यता पर संदेह पैदा होता है।
उसने कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों से भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 के तहत कोई अपराध नहीं बनता।
हालांकि हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि जांच अभी जारी है और आरोपी जाम्बिया में रह रहा है तथा उसने जांच में सहयोग भी नहीं किया है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य मामले का भी उल्लेख किया।
अदालत ने कहा कि झूठे विवाह वादे और सद्भावना में किए गए लेकिन बाद में पूरे न हो सके वादे में स्पष्ट अंतर है। यदि शुरू से ही शादी करने की मंशा न हो और केवल झूठा भरोसा देकर संबंध बनाए जाएं तो यह दंडनीय अपराध बनता है।
अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी का यह मामला नहीं है कि शादी की कोई प्रक्रिया शुरू हुई थी या किसी अपरिहार्य परिस्थिति के कारण विवाह नहीं हो सका। ऐसे में FIR रद्द करने का कोई आधार नहीं बनता।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने आरोपी की याचिका खारिज की।

