जन्म रजिस्टर में दर्ज तारीख से उम्र साबित नहीं होती, गुजरात हाईकोर्ट ने POCSO मामले में बरी करने का फैसला बरकरार रखा
Amir Ahmad
28 Oct 2026 12:39 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के आरोप से जुड़े POCSO मामले में आरोपी को बरी करने के निचली अदालत का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि केवल जन्म रजिस्टर पेश कर देने से पीड़िता की उम्र साबित नहीं हो जाती। अभियोजन को यह भी प्रमाणित करना होगा कि रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि की जानकारी किस स्रोत से मिली थी।
जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छानी की खंडपीठ शिकायतकर्ता की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसकी नाबालिग बेटी के अपहरण और दुष्कर्म के आरोप में आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई।
मामले के अनुसार आरोपी का लड़की के साथ संबंध था। आरोप था कि एक रात वह लड़की के घर पहुंचा और उसे अपने साथ भागकर शादी करने के लिए कहा। लड़की ने कथित तौर पर कहा कि वह कम उम्र की है पढ़ाई कर रही है और कहीं नहीं जाना चाहती। आरोप है कि इसके बाद आरोपी ने उसके साथ जाने से इनकार करने पर मरने की धमकी देने की बात कही और उसे अपने साथ ले गया। शिकायत के अनुसार आरोपी उसे गांव के बाहरी इलाके में स्थित एक घर में ले गया जहां उसके साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध शारीरिक संबंध बनाए।
घटना 7 जून 2024 की बताई गई। सेशंस कोर्ट ने आरोपी को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि घटना के समय लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम थी। जन्म रजिस्टर और जन्म प्रमाणपत्र की प्रति पेश करने वाले धोळिया ग्राम पंचायत के तलाटी-कम-मंत्री ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि जन्म का पंजीकरण उसकी मौजूदगी में नहीं हुआ। अभियोजन न तो अस्पताल से भेजा गया कोई दस्तावेज पेश कर पाया और न ही उस व्यक्ति का लिखित आवेदन, जिसने जन्म दर्ज कराया था। जन्म रजिस्टर में भी यह स्पष्ट नहीं था कि जन्मतिथि की जानकारी किसने दी थी।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बिरका शिवा बनाम तेलंगाना राज्य मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि स्कूल प्रमाणपत्र या जन्म रिकॉर्ड मात्र से पीड़िता की उम्र साबित नहीं होती। किसी दस्तावेज को अदालत में पेश कर उसे साक्ष्य के रूप में दर्ज कराना ही उसकी सामग्री को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ऐसे व्यक्तियों की गवाही जरूरी है, जो दर्ज तथ्यों की सत्यता की पुष्टि कर सकें।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में अभियोजन जन्म रजिस्टर में दर्ज जन्मतिथि के स्रोत को साबित करने में विफल रहा। इसलिए यह प्रमाणित नहीं हुआ कि घटना के दिन पीड़िता नाबालिग थी।
अपहरण और दुष्कर्म के आरोपों पर विचार करते हुए कोर्ट ने लड़की के बयान और उसके आचरण का भी उल्लेख किया। रिकॉर्ड के अनुसार, घटना की रात वह अपने भाई-बहनों के साथ घर की छत पर सो रही थी, जबकि उसके माता-पिता खेत गए हुए थे। अदालत ने उसके बयान में आरोपी के साथ जाने, रिक्शा से यात्रा करने और बाद में पैदल चलने के दौरान आसपास के लोगों से मदद नहीं मांगने संबंधी बातों पर विचार किया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि पुलिस को दिए गए बयान में लड़की ने कुछ कथित धमकियों और जबरन रिक्शा में बैठाए जाने की बात नहीं बताई।
हाईकोर्ट ने कहा कि पीड़िता की उम्र साबित नहीं होने और रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियों को देखते हुए अभियोजन का मामला संदेह से परे साबित नहीं हुआ। अदालत ने लड़की के साथ जबरदस्ती किए जाने और दुष्कर्म के आरोपों को भी भरोसेमंद नहीं माना।
अंततः हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी करने के सेशंस कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया और शिकायतकर्ता की अपील खारिज की।

