बिलकिस बानो मामले के दोषी राधेश्याम शाह को हाईकोर्ट ने दी 7 दिन की पैरोल

  • बिलकिस बानो मामले के दोषी राधेश्याम शाह को हाईकोर्ट ने दी 7 दिन की पैरोल

    गुजरात हाईकोर्ट ने 2002 के बिलकिस बानो सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों में से एक राधेश्याम शाह को सात दिन की पैरोल मंजूर की। जस्टिस संजीव जे. ठाकेर ने 17 सितंबर को शाह की याचिका आंशिक रूप से मंजूर करते हुए यह आदेश दिया।

    कोर्ट ने शाह को वास्तविक रिहाई की तारीख से सात दिनों के लिए पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया। इसके लिए उसे संबंधित जेल प्राधिकरण की संतुष्टि के अनुसार 10 हजार रुपये का निजी मुचलका देना होगा। पैरोल की अवधि समाप्त होते ही उसे बिना किसी देरी के जेल प्रशासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा। साथ ही रिहाई की तारीख से हर तीसरे और पांचवें दिन उसे नजदीकी पुलिस स्टेशन में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी होगी।

    मुंबई की विशेष अदालत ने 21 जनवरी 2008 के फैसले में शाह समेत 11 आरोपियों को सामूहिक दुष्कर्म और हत्या समेत विभिन्न अपराधों में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मामले में बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म, उनकी मां और चचेरी बहन की सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या तथा तीन साल से अधिक उम्र की उनकी बेटी समेत 12 अन्य लोगों की हत्या के आरोप शामिल थे। एक पुलिसकर्मी को FIR गलत तरीके से दर्ज करने के मामले में भी दोषी ठहराया गया।

    दोषियों को IPC की धारा 143, 147, 148 और 302 के साथ धारा 149 के तहत 14 लोगों की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया। इसके अलावा बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म के लिए धारा 376(2)(e) और 376(2)(g) तथा अन्य महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म के लिए धारा 376(2)(g) के तहत भी दोषसिद्धि हुई।

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने 4 मई 2017 को ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2017 को दोषियों की विशेष अनुमति याचिकाएं खारिज करते हुए हाईकोर्ट का फैसला और सजा बरकरार रखा था।

    शाह ने इससे पहले CrPC की धाराओं 433 और 433A के तहत समय से पहले रिहाई के उसके आवेदन पर विचार नहीं किए जाने को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। वर्ष 2019 में हाईकोर्ट ने कहा था कि CrPC की धारा 432(7) के तहत धारा 432 और 433 के लिए संबंधित सरकार महाराष्ट्र सरकार है और शाह को महाराष्ट्र में उचित उपाय अपनाना चाहिए।

    इसके बाद शाह ने सजा में छूट यानी रिमिशन के लिए गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन कोर्ट ने अधिकार क्षेत्र के अभाव में याचिका खारिज की। हाईकोर्ट ने कहा था कि रिमिशन पर फैसला लेने के लिए महाराष्ट्र सरकार ही संबंधित सरकार है।

    मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपराध गुजरात में हुआ था, इसलिए रिमिशन आवेदन पर गुजरात सरकार को फैसला करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले को असाधारण परिस्थितियों में केवल ट्रायल के सीमित उद्देश्य से महाराष्ट्र स्थानांतरित किया गया। इसके बाद उस समय लागू रिमिशन नीति के आधार पर गुजरात सरकार ने अगस्त 2022 में 11 दोषियों को समय से पहले रिहा किया।

    हालांकि, 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार द्वारा दी गई रिमिशन रद्द की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि चूंकि ट्रायल महाराष्ट्र में हुआ था, इसलिए रिमिशन पर फैसला लेने के लिए गुजरात सरकार संबंधित सरकार नहीं थी। गुजरात सरकार को सक्षम प्राधिकारी नहीं पाए जाने के कारण उसके रिमिशन आदेशों को अमान्य कर दिया गया।

    सुप्रीम कोर्ट ने इसके बाद अगस्त 2022 में समय से पहले रिहा किए गए दोषियों को दो सप्ताह के भीतर जेल में वापस आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

    अब गुजरात हाईकोर्ट ने शाह को सात दिन की पैरोल मंजूर की, जिसमें जेल प्रशासन के समक्ष समय पर आत्मसमर्पण और नियमित पुलिस उपस्थिति समेत शर्तें लागू रहेंगी।

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