पत्नी-बच्चों का भरण-पोषण करना पति का कानूनी और नैतिक कर्तव्य: गुजरात हाईकोर्ट, 660 दिन की सजा बरकरार
Amir Ahmad
8 April 2026 5:55 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में पत्नी और बच्चों को भरण-पोषण राशि न देने वाले पति की 660 दिन की सजा बरकरार रखी। अदालत ने स्पष्ट कहा कि पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करना पति का कानूनी ही नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य भी है, जिससे वह बच नहीं सकता।
जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने फैमिली कोर्ट का आदेश सही ठहराते हुए पति की याचिका खारिज की। पति ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण की राशि न चुकाने पर 660 दिन की साधारण कारावास की सजा दी गई थी।
मामले के अनुसार, पति को अपनी पत्नी और दो बच्चों को कुल 3,97,000 रुपये की बकाया भरण-पोषण राशि देनी थी। जब उसने भुगतान नहीं किया तो वसूली के लिए आवेदन दायर किया गया। इसके बाद पति स्वयं अदालत में उपस्थित हुआ और यह कहते हुए आत्मसमर्पण कर दिया कि वह राशि चुकाने में असमर्थ है।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, पति ने यह भी स्वीकार किया कि वह न तो इस राशि का भुगतान कर सकता है और न ही वह पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण करने के लिए तैयार है। उसने भुगतान के लिए कोई अतिरिक्त समय भी नहीं मांगा।
फैमिली कोर्ट ने उसे समझाया कि भुगतान न करने की स्थिति में उसे सजा भुगतनी पड़ेगी। इसके बावजूद उसने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए हस्ताक्षर किए।
इसी आधार पर फैमिली कोर्ट ने हर महीने की बकाया राशि के लिए 10 दिन की सजा तय की। चूंकि 66 महीने तक भुगतान नहीं किया गया, इसलिए कुल 660 दिन की सजा सुनाई गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह सजा अनुपातहीन नहीं है, क्योंकि पति ने स्वयं अपनी जिम्मेदारी और असमर्थता स्वीकार की थी।
अदालत ने कहा,
“पति अपने कर्तव्यों से बच नहीं सकता। पत्नी और बच्चों को वही जीवन स्तर पाने का अधिकार है, जैसा वे साथ रहते हुए पाते थे।”
अदालत ने यह भी कहा कि विभिन्न फैसलों में यह स्थापित किया जा चुका है कि पति अपने दायित्व से नहीं बच सकता और यह उसका सामाजिक तथा कानूनी दायित्व है।
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने उचित कारणों के आधार पर आदेश पारित किया था और उसमें किसी प्रकार की त्रुटि या अन्याय नहीं है। इसलिए हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं है।
अंततः हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए पति की सजा बरकरार रखी।

