वक्फ संपत्ति की धार्मिक पहचान तय करने की जांच पर पूजा स्थल कानून की रोक नहीं: गुजरात हाईकोर्ट
Amir Ahmad
16 Sept 2026 12:31 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि किसी धार्मिक स्थल की मूल प्रकृति और धार्मिक पहचान का पता लगाने के लिए वक्फ बोर्ड की ओर से की गई जांच, पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 की धारा 3 के तहत प्रतिबंधित नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी मौजूदा पूजा स्थल को एक धर्म या संप्रदाय से दूसरे में परिवर्तित करने और किसी संपत्ति की मूल प्रकृति व धार्मिक पहचान निर्धारित करने के बीच अंतर है।
जस्टिस जे. सी. दोशी ने गुजरात वक्फ बोर्ड और वक्फ न्यायाधिकरण के उन आदेशों को बरकरार रखा, जिनके तहत पाटन स्थित ऐतिहासिक धार्मिक स्थल का नाम “मौलाना मेहबूब दरगाह मस्जिद और कब्रिस्तान” से बदलकर “मौलाना याकूब साहेब दरगाह और दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान” किए जाने का आदेश दिया गया। वक्फ बोर्ड ने माना था कि यह धार्मिक स्थल दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित है।
कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि यह धार्मिक स्थल मूल रूप से सुन्नी-हनफी-बरेलवी संप्रदाय का है और बाद में इसे किसी अन्य संप्रदाय में परिवर्तित किया गया।
जस्टिस दोशी ने कहा कि निचली अदालतों और हाईकोर्ट ने धार्मिक स्थल के पंजीकरण तथा उसे न्यास के रूप में पंजीकृत किए जाने से पहले के दस्तावेजों की जांच की। इनमें कहीं भी यह दर्ज नहीं था कि यह धार्मिक स्थल सुन्नी-हनफी-बरेलवी संप्रदाय का है। ऐसे में इस दावे का कोई दस्तावेजी आधार नहीं है कि धार्मिक स्थल मूल रूप से सुन्नी-हनफी-बरेलवी संप्रदाय का है और बाद में इसे शिया संप्रदाय में परिवर्तित कर दिया गया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया,
“मौजूदा पूजा स्थल को धार्मिक प्रभुत्व या संप्रदाय से दूसरे में परिवर्तित करने का मामला नहीं है, बल्कि संपत्ति की मूल प्रकृति और स्वरूप का निर्धारण करना है। ऐसी जांच पर पूजा स्थल अधिनियम के प्रावधानों की रोक लागू नहीं होती।”
मामला पाटन जिले के अनावाड़ा गांव में स्थित एक धार्मिक स्थल से जुड़ा है। अपीलकर्ताओं, जो फारूकी परिवार के सदस्य हैं, का दावा था कि यह स्थल “मौलाना मेहबूब दरगाह मस्जिद और कब्रिस्तान” है। उनके अनुसार यह हजरत मौलाना मेहबूब की कब्र पर बनाया गया, जिनकी मृत्यु 1377 ईस्वी में हुई थी और उन्हें सर्वे नंबर 935 की जमीन में दफनाया गया।
अपीलकर्ताओं का कहना है कि यह स्थल हनफी-सुन्नी-बरेलवी परंपरा का है और उनके पूर्वज 1953 में बंबई सार्वजनिक न्यास अधिनियम के तहत पंजीकरण के बाद से वहां मुजावर यानी देखरेख करने वाले के रूप में काम करते हैं। बाद में वे मुतवल्ली के रूप में भी कार्य करने लगे। वर्ष 2015 में वक्फ बोर्ड ने एक पारिवारिक प्रस्ताव के आधार पर उनका दर्जा मुजावर से मुतवल्ली कर दिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों का कहना था कि यह धार्मिक स्थल मौलाना याकूब नामक संत का है, जो दाऊदी बोहरा समुदाय से संबंधित थे। उन्होंने वक्फ रजिस्टर में स्थल का नाम “मौलाना याकूब साहेब दरगाह और दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान” दर्ज करने की मांग की।
वक्फ बोर्ड ने बाद में स्थल का नाम बदलने का आदेश दिया, जिसे वक्फ न्यायाधिकरण ने भी बरकरार रखा। न्यायाधिकरण ने 2015 में अपीलकर्ताओं को मुतवल्ली नियुक्त करने वाले वक्फ बोर्ड का आदेश भी रद्द कर दिया। इसके बाद फारूकी परिवार ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
हाईकोर्ट ने राजस्व अभिलेखों का भी परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि गायकवाड़ शासन के समय जमीन का उल्लेख “मौलाना याकूब साहेब दरगाह, दाऊदी बोहरा कब्रिस्तान पीर नी जागो” के रूप में किया गया था। वर्ष 1934-35 के बाद इसमें “मलानशाह पीर नी जागो” नाम दर्ज होने लगा। वहीं, “मौलाना मेहबूब दरगाह मस्जिद और कब्रिस्तान” नाम न्यास के रूप में पंजीकरण के बाद सामने आया।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि न्यास का पंजीकरण नानीबाई ने मुजावर के रूप में कराया। उस समय कोई वक्फनामा या ऐसा दस्तावेज पेश नहीं किया गया, जिससे वक्फ की स्थापना, उसका नाम या मुतवल्ली की नियुक्ति और उत्तराधिकार की व्यवस्था स्पष्ट होती हो।
जस्टिस दोशी ने धार्मिक स्थल पर लगे एक प्राचीन शिलालेख का भी उल्लेख किया। कोर्ट के अनुसार, शिलालेख में “मौलाना याकूब” को समुदाय की ओर से सम्मान के तौर पर “मेहबूब” और “माशूक” कहे जाने का उल्लेख था। कोर्ट ने कहा कि इस शिलालेख से धार्मिक स्थल का संबंध मौलाना याकूब से दिखाई देता है, न कि मौलाना मेहबूब से।
मुतवल्ली के उत्तराधिकार के मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि मुजावर मूल रूप से धार्मिक स्थल की देखरेख करने वाला व्यक्ति होता है और उसे मुजावर के पद पर कोई वंशानुगत अधिकार प्राप्त नहीं होता। खासकर तब, जब वक्फ की स्थापना या उत्तराधिकार की व्यवस्था तय करने वाला कोई दस्तावेज मौजूद न हो।
कोर्ट ने कहा कि नानीबाई के निधन के बाद उनके परिवार के सदस्यों ने मुजावर और बाद में मुतवल्ली के रूप में काम करना शुरू किया। लेकिन केवल पारिवारिक दावे के आधार पर किसी व्यक्ति को मुतवल्ली का कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वक्फ बोर्ड ने वर्ष 2015 में अपीलकर्ताओं का दर्जा मुजावर से मुतवल्ली करते समय वक्फ के पंजीकरण आवेदन में दर्ज उत्तराधिकार की व्यवस्था का पालन नहीं किया। बोर्ड ने परिवार के भीतर पारित प्रस्ताव के आधार पर यह बदलाव किया था।
कोर्ट ने कहा कि जब वक्फनामे की शर्तों के अनुसार मुतवल्ली नियुक्त करने वाला कोई व्यक्ति उपलब्ध न हो या किसी व्यक्ति के मुतवल्ली के रूप में कार्य करने के अधिकार पर विवाद हो तो वक्फ अधिनियम की धारा 63 में निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया का पालन नहीं होने के कारण फारूकी परिवार का मुतवल्ली, न्यासी या प्रबंधक के रूप में नियुक्ति का दावा कानूनी आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने फारूकी परिवार के आचरण पर भी कड़ी टिप्पणी की।
जस्टिस दोशी ने कहा कि घटनाक्रम से प्रथमदृष्टया ऐसा दिखाई देता है कि पूरी प्रक्रिया अंततः परिवार के दावे के लाभ में गई और धार्मिक स्थल को व्यक्तिगत या पारिवारिक संपत्ति के रूप में पेश करने की कोशिश की गई।
कोर्ट ने कहा कि धार्मिक स्थल को “मौलाना मेहबूब दरगाह मस्जिद और कब्रिस्तान” के नाम से पंजीकृत कराने के लिए ऐसा कोई विश्वसनीय दस्तावेज या प्रमाण सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि स्थल वास्तव में इसी नाम से स्थापित या जाना जाता था। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को धार्मिक स्थल के संबंध में धोखाधड़ीपूर्ण आचरण बताया।
अपीलकर्ताओं की यह दलील भी हाईकोर्ट ने खारिज की कि वक्फ बोर्ड की जांच के दौरान उन्हें व्यक्तिगत सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 2026 के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि वक्फ अधिनियम की धारा 32, 40 और 41 के तहत इस तरह की जांच में पूर्ण न्यायिक सुनवाई की तरह व्यक्तिगत या मौखिक सुनवाई अनिवार्य नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ताओं ने जांच की कार्यवाही में हिस्सा लिया और बाद में मामले में आगे की न्यायिक कार्यवाही भी की। ऐसे में वे यह दावा नहीं कर सकते कि उन्हें उचित अवसर नहीं मिला।
इन टिप्पणियों के साथ गुजरात हाईकोर्ट ने फारूकी परिवार की अपील खारिज की और वक्फ बोर्ड तथा वक्फ न्यायाधिकरण के आदेशों को बरकरार रखा।


