कार्यस्थल पर हार्ट अटैक से मौत को स्वतः 'रोजगार चोट' नहीं माना जा सकता: हाईकोर्ट ने मुआवजा खारिज किया
Amir Ahmad
15 April 2026 1:00 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट किया कि कार्यस्थल पर हार्ट अटैक से हुई मृत्यु को स्वतः रोजगार से उत्पन्न चोट नहीं माना जा सकता। इसके लिए यह साबित करना आवश्यक है कि मृत्यु और रोजगार के बीच सीधा संबंध (नैक्सस) हो।
जस्टिस जे.सी. दोशी ने कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम की धारा 2(8) का हवाला देते हुए कहा कि “रोजगार चोट” वही मानी जाएगी जो दुर्घटना या व्यावसायिक बीमारी के कारण हो और जो रोजगार के दौरान तथा उससे उत्पन्न हुई हो।
मामला मैकेनिक की मृत्यु से जुड़ा था, जिसकी कार्य के दौरान हार्ट अटैक से मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण कोरोनरी हृदय रोग के कारण कार्डियो-रेस्पिरेटरी अरेस्ट बताया गया।
अदालत ने पाया कि मृतक के परिजनों की ओर से यह साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया कि हार्ट अटैक का सीधा संबंध उसके काम से था या यह कोई व्यावसायिक बीमारी थी।
अदालत ने कहा,
“केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि मृतक पहले से बीमार नहीं था और काम के तनाव के कारण उसकी मृत्यु हुई। यह साबित करना आवश्यक है कि मृत्यु का सीधा संबंध रोजगार से था।”
हाईकोर्ट ने मैक्किनन मैकेंजी एंड कंपनी बनाम इब्राहिम महमद इस्साक (1969) और शकुंतला चंद्रकांत श्रेष्ठी बनाम प्रभाकर मारुति गरवली (2007) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला दिया। इनमें कहा गया कि दावा करने वाले पर यह जिम्मेदारी होती है कि वह यह स्थापित करे कि दुर्घटना या बीमारी रोजगार के दौरान और उससे उत्पन्न हुई।
अदालत ने यह भी कहा कि हृदय रोग कम उम्र में भी हो सकता है और कई बार बिना लक्षण के भी रहता है, इसलिए केवल कार्यस्थल पर मृत्यु होना पर्याप्त नहीं है।
मामले के अनुसार, मृतक एक औद्योगिक इकाई में फिटर के रूप में कार्यरत था। काम के दौरान उसे सीने और पेट में दर्द हुआ, जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
पहले कर्मचारी राज्य बीमा निगम ने मुआवजा देने से इनकार किया था, लेकिन ESI कोर्ट ने परिजनों के पक्ष में फैसला दिया। इस आदेश को चुनौती देते हुए निगम हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट ने निगम की अपील स्वीकार करते हुए ESI कोर्ट का आदेश रद्द किया और कहा कि रोजगार और मृत्यु के बीच आवश्यक संबंध सिद्ध नहीं किया गया, इसलिए लाभ नहीं दिया जा सकता।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अब तक परिजनों को जो भी लाभ मिला है, उसकी वसूली नहीं की जाएगी।

