गाय हिंदू-जैन समाज के लिए पूजनीय, बार-बार ऐसा अपराध जनभावनाएं आहत कर सकता है: गुजरात हाईकोर्ट ने जमानत से किया इनकार
Amir Ahmad
30 Jun 2026 5:41 PM IST

गुजरात हाईकोर्ट ने गोहत्या मामले में आरोपी मोहम्मद आरिफ अब्दुल रज्जाक समोल की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि गाय हिंदू और जैन समुदाय के बड़े वर्ग के लिए पूजनीय है। ऐसे मामलों में बार-बार संलिप्तता जनभावनाओं को आहत कर सकती है और क्षेत्र में सामाजिक तनाव तथा कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है।
जस्टिस हसमुख डी. सुथार की पीठ आरोपी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। आरोपी के खिलाफ गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता और गुजरात पुलिस अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि मामले में आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है और मुकदमे के पूरा होने में लंबा समय लग सकता है, इसलिए उसे जमानत दी जाए।
वहीं, अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि आरोपी आदतन अपराधी है और उसके खिलाफ इसी तरह के आठ पुराने आपराधिक मामले दर्ज हैं। पुलिस की छापेमारी के दौरान आरोपी के घर से सटे एक भूखंड में रखे प्लास्टिक के थैले से 23 किलोग्राम गोमांस बरामद किया गया। अभियोजन के अनुसार, आरोपी गोवंश के अवैध वध के लिए कुछ लोगों को लगाता था और छापेमारी के दौरान तीन सह-आरोपी मौके से फरार हो गए, जिन्हें अभी तक गिरफ्तार नहीं किया जा सका।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
"प्रथम-दृष्टया आरोप बताते हैं कि आवेदक गोवंश के अवैध वध और परिवहन से जुड़े अपराधों में बार-बार शामिल रहा है। ऐसी गतिविधियां न केवल कानून के उद्देश्य को विफल करती हैं, बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं। अदालत इस तथ्य से आंखें नहीं मूंद सकती कि गाय हिंदू और जैन समुदाय सहित भारतीय समाज के बड़े वर्ग के लिए पूजनीय और संरक्षण योग्य मानी जाती है। ऐसे अपराधों में बार-बार संलिप्तता जनभावनाओं को आहत कर सकती है और स्थानीय स्तर पर सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है।"
अदालत ने कहा कि आरोपी के खिलाफ समान प्रकृति के आठ पुराने मामले दर्ज हैं और जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्य प्रथम-दृष्टया उसके कथित अपराध में शामिल होने की ओर संकेत करते हैं। साथ ही तीन सह-आरोपियों की गिरफ्तारी अभी बाकी है।
हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 48 का भी उल्लेख किया, जिसमें राज्य को गाय, बछड़ों तथा अन्य दुग्ध और भारवाही पशुओं के संरक्षण और उनके वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने का निर्देश दिया गया। इसके अलावा अनुच्छेद 51(क)(जी) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य है कि वह जीवित प्राणियों के प्रति करुणा रखे और प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे।
अदालत ने कहा कि यद्यपि मूल कर्तव्य स्वयं लागू कराने योग्य नहीं हैं, फिर भी वे संविधान की भावना और विधायिका की मंशा को दर्शाते हैं। इन्हीं संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम और पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण संबंधी कानून बनाए गए।
मामले की गंभीरता, बरामदगी, जांच में मिले प्रथमदृष्टया साक्ष्यों, आरोपी के आपराधिक इतिहास और पहले जमानत मिलने के बाद भी समान गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों को देखते हुए हाइकोर्ट ने जमानत देने से इनकार किया।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि आरोपपत्र दाखिल हो चुका है, इसलिए आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार की रक्षा के लिए विचारण अदालत मुकदमे का शीघ्र निस्तारण करने का प्रयास करे और अभियोजन प्रमुख गवाहों की जल्द-से-जल्द गवाही सुनिश्चित करे।

