ChatGPT के अत्यधिक इस्तेमाल से वैवाहिक विवाद बढ़ने का आरोप: गुजरात हाईकोर्ट ने माँ को दी गई बच्ची की कस्टडी में दखल देने से किया इनकार

  • ChatGPT के अत्यधिक इस्तेमाल से वैवाहिक विवाद बढ़ने का आरोप: गुजरात हाईकोर्ट ने माँ को दी गई बच्ची की कस्टडी में दखल देने से किया इनकार

    गुजरात हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी की कस्टडी मां के पास रहने के मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार किया। मामले में मां ने आरोप लगाया कि पति की ChatGPT पर अत्यधिक निर्भरता ने उनके वैवाहिक विवाद को और बढ़ा दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्ची की भलाई सर्वोपरि है और मौजूदा परिस्थितियों में मां के पास उसकी कस्टडी को अवैध नहीं कहा जा सकता।

    जस्टिस इलेश जे. वोरा और जस्टिस आर.टी. वच्छाणी की खंडपीठ पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पिता ने आरोप लगाया कि उसकी नाबालिग बेटी को मां ने अवैध रूप से अपने पास रखा है और उसे बच्ची से मिलने भी नहीं दिया जा रहा है।

    मां ने अपने पति को भेजे गए कानूनी नोटिस के जवाब में आरोप लगाया कि पति ने छोटी-छोटी और रोजमर्रा की बातों के लिए भी ChatGPT का अत्यधिक इस्तेमाल करने की आदत विकसित कर ली थी। वह बार-बार इस मंच से बातचीत करता था। मां के अनुसार धीरे-धीरे पति ने कई तरह की कहानियां और धारणाएं गढ़नी शुरू कर दीं जिसका उसके व्यवहार और पत्नी के साथ पारस्परिक संबंधों पर असर पड़ा। इससे दोनों के बीच वैवाहिक विवाद लगातार बढ़ता गया।

    महिला ने यह भी आरोप लगाया कि पति उसके लिए “मां चालबाज है”, “बेटी चोर है”, “मामा वसूली करने वाला है” और “पिता रीढ़विहीन है” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता था। महिला के अनुसार ये बातें ChatGPT पर पति की अत्यधिक निर्भरता की ओर संकेत करती थीं।

    महिला ने अन्य आरोप लगाते हुए कहा कि अप्रैल 2025 में दांतों के इलाज के दौरान पति को संबंधित डॉक्टर से एकतरफा रोमांटिक लगाव हो गया। उसने बताया कि मई 2025 में उसने पति और उसके परिवार के सामने ChatGPT के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई और पति से ऐसा करना कम करने का अनुरोध किया, लेकिन उसके व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया।

    पिता ने अपनी याचिका में दावा किया कि पत्नी वैवाहिक घर छोड़कर चली गई थी और उस समय नाबालिग बेटी उसके पास थी। कुछ महीने बाद पत्नी ने उसकी जानकारी के बिना बच्ची को अपने पास रख लिया। पिता के अनुसार जब उसने बेटी से मिलने की कोशिश की, तो मां ने उसे बच्ची से मिलने की अनुमति नहीं दी।

    पिता ने इस संबंध में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद उसने मजिस्ट्रेट के समक्ष निजी शिकायत दायर की। मजिस्ट्रेट ने नोटिस जारी किया, लेकिन कहा कि बच्ची की कस्टडी सुनिश्चित करने के लिए आदेश पारित करना उचित नहीं होगा क्योंकि कस्टडी का सवाल लागू कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार तय किया जाना चाहिए। मजिस्ट्रेट ने पिता को सक्षम मंच के समक्ष उचित कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी।

    इसके बाद पिता ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की और बेटी को अदालत के समक्ष पेश करने तथा उसकी कस्टडी दिलाने की मांग की।

    मामले पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बच्ची का कल्याण सर्वोपरि है। अदालत ने माना कि करीब दो वर्ष तीन महीने की बच्ची का मां के पास रहना मौजूदा परिस्थितियों में अवैध कस्टडी नहीं कहा जा सकता। पत्नी की ओर से लगाए गए आरोपों और दोनों पक्षों के बीच विवाद की प्रकृति को देखते हुए अदालत को बच्ची की कस्टडी बदलने का कोई आधार नहीं मिला।

    खंडपीठ ने कहा कि इस मामले में कस्टडी के प्रश्न पर सक्षम अदालत द्वारा विस्तृत जांच की आवश्यकता है, क्योंकि विवाद में कई ऐसे तथ्य शामिल हैं, जिन पर दोनों पक्षों के अलग-अलग दावे हैं। इन तथ्यों का निर्धारण विस्तृत साक्ष्य दर्ज करने और उनकी जांच के बाद ही किया जा सकता है।

    हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को कानून के अनुसार उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष सक्षम अदालत के समक्ष कस्टडी के संबंध में आवेदन दाखिल करता है तो उस अदालत को हाईकोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना कानून के अनुसार मामले का फैसला करना होगा।

    अंत में हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने बच्ची की स्थायी या अंतरिम कस्टडी को लेकर दोनों पक्षों के परस्पर विरोधी दावों की विस्तृत जांच नहीं की और न ही इस संबंध में कोई राय व्यक्त की। अदालत का आदेश केवल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर विचार करते हुए पारित किया गया।

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