अनुशासन नियम लागू होने पर बिना विभागीय जांच संविदा कर्मचारी की सेवा समाप्त नहीं की जा सकती: गौहाटी हाइकोर्ट
Amir Ahmad
14 Jan 2026 3:09 PM IST

गौहाटी हाइकोर्ट ने अहम फैसला देते हुए कहा कि यदि किसी संविदा कर्मचारी की नियुक्ति में स्पष्ट रूप से वैधानिक अनुशासन और अपील नियम लागू किए गए तो कथित अनुशासनहीनता के आधार पर उसकी सेवा बिना विभागीय जांच के समाप्त नहीं की जा सकती।
हाइकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में सेवा समाप्ति दंडात्मक मानी जाएगी और नियमों में निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा।
चीफ जस्टिस आशुतोष कुमार और जस्टिस अरुण देव चौधरी की खंडपीठ ने यह फैसला असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण में संविदा पर नियुक्त परियोजना अधिकारी के मामले में सुनाया। कर्मचारी की नियुक्ति निश्चित अवधि के लिए संविदा आधार पर की गई, लेकिन उसकी नियुक्ति शर्तों में यह स्पष्ट था कि उसकी सेवा असम सेवा (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1964 के अधीन रहेगी।
मामले के अनुसार, वर्ष 2018 में कर्मचारी के पिता गंभीर रूप से बीमार हो गए, जिसके कारण उसने मौखिक रूप से अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना देकर मुख्यालय छोड़ दिया।
बाद में वह औपचारिक अवकाश आवेदन देने का इरादा रखता था, लेकिन इस बीच उसकी अनुपस्थिति को अनधिकृत मानते हुए विभाग ने उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया और कथित गंभीर अनुशासनहीनता के आधार पर उसकी संविदा सेवा समाप्त कर दी।
इस कार्रवाई से आहत कर्मचारी ने गौहाटी हाइकोर्ट में याचिका दायर की।
सिंगल जज ने सेवा समाप्ति को अवैध ठहराते हुए कर्मचारी को पुनः बहाल करने का आदेश दिया और विभाग को कानून के अनुसार नई कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी। इसके खिलाफ असम सरकार ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि कर्मचारी केवल संविदा आधार पर कार्यरत था और संविदा नवीनीकरण पूरी तरह विभाग के विवेक पर निर्भर करता है।
यह भी कहा गया कि वह आदतन अनुपस्थित रहता था, इसलिए सेवा समाप्ति उचित थी। सरकार ने यह तर्क भी दिया कि संविदा कर्मचारियों पर अनुशासन नियमों का पूर्ण रूप से लागू होना आवश्यक नहीं है।
वहीं कर्मचारी की ओर से कहा गया कि जब नियुक्ति पत्र में स्पष्ट रूप से 1964 के अनुशासन नियम लागू किए गए तो विभाग उन नियमों से पीछे नहीं हट सकता।
उसके अनुसार अनुशासनहीनता के आधार पर सेवा समाप्ति एक बड़ा दंड है, जिसे नियम 9 के तहत विभागीय जांच के बिना नहीं दिया जा सकता।
हाइकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यद्यपि कर्मचारी संविदा पर नियुक्त था, लेकिन जब नियोक्ता ने स्वयं अनुशासन नियमों को संविदा का हिस्सा बनाया है, तो वह उन्हें चुनिंदा रूप से लागू नहीं कर सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुशासनहीनता या अनधिकृत अनुपस्थिति के आधार पर सेवा समाप्ति दंडात्मक प्रकृति की होती है और इसके गंभीर नागरिक परिणाम होते हैं।
खंडपीठ ने कहा कि नियम 9 के अनुसार किसी भी बड़े दंड से पहले नियमित विभागीय जांच, आरोप तय करना और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर देना आवश्यक है। चूंकि इस मामले में ऐसा नहीं किया गया, इसलिए सेवा समाप्ति अवैध है।
इन निष्कर्षों के साथ गौहाटी हाइकोर्ट ने सिंगल जज का आदेश सही ठहराया और राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।

