हॉस्टल के खाने की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर यूनिवर्सिटी लापरवाही नहीं बरत सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
15 Oct 2026 12:50 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी हॉस्टल की मेस में परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता को लेकर लापरवाह रवैया नहीं अपना सकते।
कोर्ट ने कहा कि विद्यार्थियों से अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शन करने की उम्मीद तब तक नहीं की जा सकती जब तक उन्हें अच्छी गुणवत्ता वाला और स्वच्छ भोजन उपलब्ध न कराया जाए।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने यह टिप्पणी जामिया मिल्लिया इस्लामिया की 20 वर्षीय छात्रा की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
छात्रा ने आरोप लगाया था कि हॉस्टल की मेस में खराब गुणवत्ता वाला भोजन खाने के कारण उसे टाइफाइड हो गया जिससे उसकी पढ़ाई और शैक्षणिक प्रदर्शन प्रभावित हुआ।
फारसी में BA ऑनर्स की पढ़ाई कर रही छात्रा ने अपने खिलाफ जारी नोटिसों और 25 सितंबर को बेगम हजरत महल गर्ल्स हॉस्टल से निकाले जाने के फैसले को चुनौती दी।
उसका आरोप है कि हॉस्टल की छात्राओं द्वारा मेस के भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत उठाए जाने में शामिल होने के बाद उसके खिलाफ यह कार्रवाई की गई।
सुनवाई के दौरान यूनिवर्सिटी ने दलील दी कि छात्रा को हॉस्टल में रहने की सुविधा इसलिए नहीं दी गई क्योंकि वह हॉस्टल मैनुअल के तहत आवास के रिन्यूअल के लिए जरूरी कुल 55 प्रतिशत अंक हासिल नहीं कर पाई।
इसके जवाब में छात्रा के वकील ने कहा कि यूनिवर्सिटी को उसके अंकों की जानकारी पहले से थी फिर भी उसे हॉस्टल में रहने की सुविधा दी गई।
वकील ने यह भी दलील दी कि मेस में खराब गुणवत्ता के भोजन के कारण छात्रा की तबीयत बिगड़ी और उसे टाइफाइड हो गया। इस वजह से उसकी पढ़ाई प्रभावित हुई और वह निर्धारित अंक हासिल नहीं कर सकी।
सुनवाई के दौरान यूनिवर्सिटी के वकील ने कोर्ट को बताया कि भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतों के बाद मेस के ठेकेदार को बदल दिया गया।
उन्होंने आश्वासन दिया कि भोजन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
यूनिवर्सिटी की ओर से यह भी कहा गया कि विद्यार्थियों से मिलने वाली शिकायतों पर तत्काल विचार किया जाएगा और भोजन की गुणवत्ता पर निगरानी रखने के लिए विश्वविद्यालय के कर्मचारी रोजाना छात्रों के साथ हॉस्टल की मेस में भोजन करेंगे।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक हासिल करने की शर्त के संबंध में यूनिवर्सिटी के रुख में गलती नहीं कही जा सकती, क्योंकि छात्रा ने स्वीकार किया है कि वह निर्धारित अंक प्राप्त नहीं कर पाई।
हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा कि छात्रा के इस दावे को देखते हुए यूनिवर्सिटी को सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए कि मेस के भोजन के कारण उसे टाइफाइड हुआ था।
कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि छात्रा की याचिका को उसके अभ्यावेदन के रूप में माना जाए। यदि हॉस्टल में कोई आवास खाली बचा हो और किसी अन्य विद्यार्थी को आवंटित न किया गया हो, तो यूनिवर्सिटी मानवीय और सहानुभूतिपूर्ण आधार पर छात्रा को आवास देने के अनुरोध पर विचार करे। इस संबंध में निर्णय सात दिनों के भीतर लेने का निर्देश दिया गया।
हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में की गई टिप्पणियों और निष्कर्षों को भविष्य के मामलों में बाध्यकारी मिसाल नहीं माना जाएगा।

