बिना सुनवाई छात्रा को निकालना कानून के राज में मंजूर नहीं: हाईकोर्ट ने DU की कार्रवाई पर लगाई रोक
Amir Ahmad
1 Oct 2026 3:03 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) की एक छात्रा के निष्कासन के आदेश पर रोक लगाते हुए कहा कि किसी शैक्षणिक संस्थान को अनुशासन बनाए रखने का अधिकार जरूर है लेकिन इस अधिकार के नाम पर छात्र को अपना पक्ष रखने के मौलिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने कहा कि संस्थागत स्वायत्तता का मतलब मनमानी या असीमित अधिकार नहीं है।
अदालत ने कहा कि शिक्षण संस्थान अनुशासन बनाए रखने और साबित कदाचार के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं लेकिन ऐसी कार्रवाई कानून और निष्पक्ष प्रक्रिया के दायरे में ही की जानी चाहिए। किसी छात्र के खिलाफ कार्रवाई से पहले उसे आरोपों पर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना जरूरी है।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने यह टिप्पणी दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ इनोवेटिव स्किल बेस्ड कोर्सेज में बेकरी और कन्फेक्शनरी के प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम में पढ़ रही छात्रा प्रियंका रावत की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।
छात्रा ने 10 सितंबर को जारी निष्कासन के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
प्रियंका रावत का आरोप है कि विश्वविद्यालय ने उन्हें न तो कारण बताओ नोटिस जारी किया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया। इसके बावजूद उन्हें पाठ्यक्रम से निष्कासित कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने इससे पहले संस्थान में साफ-सफाई और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी शिकायतें भी उठाई थीं। इनमें जंग लगे ओवन, गंदे उपकरण और ऐसी कच्ची सामग्री के इस्तेमाल का आरोप शामिल था, जिसकी उपयोग अवधि समाप्त हो चुकी थी।
हाईकोर्ट ने पाया कि विश्वविद्यालय के आदेश में छात्रा के कथित आचरण को लेकर कई निष्कर्ष दर्ज किए गए। आदेश में उसके व्यवहार को कथित तौर पर ऊंची आवाज में बोलने वाला, अभद्र और अनादरपूर्ण बताया गया।
हालांकि, अदालत के मुताबिक कार्रवाई से पहले इन आरोपों को छात्रा के सामने रखकर उसका पक्ष जानने की प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया विश्वविद्यालय का आदेश प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी करता दिखाई देता है।
जस्टिस जस्मीत सिंह ने कार्रवाई के तरीके को तानाशाहीपूर्ण बताते हुए कहा कि कानून के शासन वाले समाज में इस तरह अधिकार का इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत दूसरे पक्ष को भी सुना जाए का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका महत्व उस समय और बढ़ जाता है जब किसी कार्रवाई का सीधा असर छात्र की पढ़ाई जारी रखने के अवसर पर पड़ता हो।
पीठ ने कहा कि यह समझना मुश्किल है कि जो शैक्षणिक संस्थान अपने छात्रों में अनुशासन, निष्पक्षता और कानून के शासन के प्रति सम्मान विकसित करने की अपेक्षा रखते हैं, वे खुद किसी छात्र के खिलाफ सबसे कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय प्राकृतिक न्याय के बुनियादी सिद्धांतों का पालन कैसे नहीं कर सकते।
सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय की ओर से पेश वकील ने स्वीकार किया कि निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
उन्होंने अदालत को बताया कि अब उचित प्रक्रिया के अनुसार नए सिरे से जांच की जाएगी।
इसके बाद हाईकोर्ट ने छात्रा के निष्कासन के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी।
अदालत ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि प्रियंका रावत को अपना पाठ्यक्रम जारी रखने की अनुमति दी जाए।
हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के संबंधित अधिकारियों को मामले में जवाबी हलफनामा दाखिल कर यह बताने का भी निर्देश दिया कि छात्रा के खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर की गई।
मामले की अगली सुनवाई 13 जनवरी 2027 को होगी।

