उच्च शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार न होने के बावजूद आसानी से नहीं छीना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

  • उच्च शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार न होने के बावजूद आसानी से नहीं छीना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि उच्च शिक्षा हासिल करने के अधिकार को केवल इसलिए आसानी से सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसे संविधान में मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट रूप से घोषित नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार के अधीन कार्यरत डॉक्टर को तीन साल का DNB सुपर स्पेशियलिटी कार्डियोलॉजी कोर्स करने के लिए छुट्टी देने की अनुमति देते हुए सरकार की आपत्तियों को दरकिनार किया।

    जस्टिस जस्मीत सिंह ने कहा कि डॉक्टर को सुपर स्पेशियलिटी कोर्स के जरिये अपने पेशेवर कौशल को बढ़ाने का अवसर मिला और इसमें बाधा डालना उसके मूल्यवान अधिकारों का उल्लंघन होगा।

    अदालत ने कहा,

    “उच्च शिक्षा हासिल करने का उसका अधिकार, भले ही मौलिक अधिकार के रूप में स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं है, लेकिन इसे आसानी से सीमित नहीं किया जा सकता।”

    अदालत डॉ. मनीष कामरा की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने अखिल भारतीय कोटे के तहत सीट मिलने के बाद जनकपुरी स्थित सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में DNB सुपर स्पेशियलिटी कार्डियोलॉजी कोर्स करने के लिए 36 महीने की एक्स्ट्राऑर्डिनरी लीव देने की मांग की।

    डॉ. कामरा ने NEET-SS 2025 परीक्षा पास की और 12 अगस्त को हुई दूसरे दौर की काउंसलिंग में उन्हें सीट आवंटित हुई। इसके बाद उन्होंने CCS (Leave) Rules, 1972 के Rule 32 के तहत 36 महीने की छुट्टी के लिए आवेदन किया।

    सरकार ने उनकी मांग का विरोध करते हुए कहा कि डॉक्टर ने NEET-SS परीक्षा में शामिल होने के लिए पहले अनुमति नहीं ली थी। यह भी दलील दी गई कि वह पहले ही 36 महीने की स्टडी लीव ले चुके हैं, इसलिए दोबारा इतनी अवधि की स्टडी लीव के पात्र नहीं हैं।

    सरकार ने यह भी कहा कि डॉक्टर ने पांच साल की सेवा पूरी करने संबंधी बॉन्ड पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत ड्यूटी पर लौटने के बाद उन्हें पांच साल तक सेवा करनी थी। सरकार के अनुसार, दूसरी पढ़ाई के लिए छुट्टी लेना बॉन्ड की शर्तों का उल्लंघन होगा।

    हाईकोर्ट ने हालांकि रिकॉर्ड पर गौर करते हुए कहा कि डॉक्टर बॉन्ड पर हस्ताक्षर करने के बाद एक साल नौ महीने की सेवा कर चुके हैं। बॉन्ड के उल्लंघन की स्थिति में उन्हें 61 लाख रुपये का भुगतान करना था।

    अदालत ने कहा कि सरकार के वित्तीय हितों को सुरक्षित किया जा सकता है। इसके लिए डॉक्टर से 61 लाख रुपये का इंडेम्निटी अंडरटेकिंग और एक अनडेटेड चेक लिया जा सकता है।

    हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि डॉ. कामरा ने फरवरी 2025 में इसी तरह की परिस्थितियों में NEET-SS परीक्षा के लिए आवेदन करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन उनका अनुरोध इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि वह पहले ही तीन साल की स्टडी लीव ले चुके हैं और दूसरी अवधि की स्टडी लीव के पात्र नहीं हैं।

    इस पर अदालत ने कहा कि पिछली बार अनुमति से इनकार करने का आधार मुख्य रूप से बॉन्ड के उल्लंघन और दूसरी स्टडी लीव के लिए डॉक्टर की पात्रता न होना था। अदालत ने कहा कि इन दोनों पहलुओं को मौजूदा मामले में पर्याप्त रूप से संबोधित किया जा चुका है, इसलिए सरकार की इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर मेडिकल स्टाफ की कमी साबित करने वाली कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई। सरकार की ओर से इस संबंध में केवल एक सामान्य दावा किया गया।

    हाईकोर्ट ने डॉक्टर के उस आश्वासन को भी ध्यान में रखा, जिसमें उन्होंने सुपर स्पेशियलिटी योग्यता हासिल करने के बाद वापस लौटकर बॉन्ड के तहत बची हुई सेवा अवधि पूरी करने की बात कही थी।

    अदालत ने निर्देश दिया कि डॉक्टर द्वारा शेष बॉन्ड अवधि पूरी करने का हलफनामा या इंडेम्निटी अंडरटेकिंग और 61 लाख रुपये का अनडेटेड चेक देने के दो दिन के भीतर उनकी छुट्टी मंजूर की जाए। अदालत ने यह भी कहा कि NOC जारी होते ही डॉक्टर को कोर्स की फीस जमा करनी होगी।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश मामले के “विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों” में पारित किया गया और इसे भविष्य के मामलों के लिए बाध्यकारी प्रक्रिया या सामान्य नियम नहीं माना जाएगा।

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story