स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच जीवन के अधिकार का हिस्सा: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल वर्क के छात्रों से औचक निरीक्षण कराने का प्रस्ताव दिया

  • स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच जीवन के अधिकार का हिस्सा: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोशल वर्क के छात्रों से औचक निरीक्षण कराने का प्रस्ताव दिया

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच का अधिकार जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने दिल्ली नगर निगम (MCD) के पूरे क्षेत्र में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति की निगरानी के लिए सोशल वर्क के छात्रों से औचक निरीक्षण कराने की व्यवस्था का प्रस्ताव दिया।

    एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन वासुदेव सांब्रे और जस्टिस संजय शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि अधिकारियों की ओर से प्रयास किए जाने के बावजूद सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति संतोषजनक नहीं है। इसी वजह से अदालत के समक्ष बार-बार शिकायतें आ रही हैं।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “संविधान में निहित राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत लगाए गए दायित्वों के अलावा, स्वच्छ सार्वजनिक शौचालयों तक पहुंच का अधिकार जीवन के अधिकार में भी शामिल है।”

    हाईकोर्ट जन सेवा वेलफेयर सोसाइटी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति सुधारने, उनके रखरखाव और स्वच्छता सुनिश्चित करने की मांग की गई।

    खंडपीठ ने कहा कि अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल मौजूदा सार्वजनिक शौचालयों का रखरखाव करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि MCD क्षेत्र की आबादी के अनुपात में पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय उपलब्ध हों।

    अदालत को बताया गया कि MCD क्षेत्र को 12 जोन में बांटा गया है और प्रत्येक जोन का नेतृत्व एक डिप्टी कमिश्नर करता है। चीफ इंजीनियर (लॉजिस्टिक्स) की जिम्मेदारी बुनियादी ढांचा और लॉजिस्टिक सहायता उपलब्ध कराने की है, जबकि सार्वजनिक शौचालयों की स्वच्छता और रखरखाव के संबंध में अंतिम प्राधिकारी एडिशनल कमिश्नर हैं।

    MCD ने अदालत को बताया कि उसने शुरुआत में जियो-टैगिंग के जरिए स्वच्छता सुविधाओं की निगरानी करने का प्रयास किया। इसके बाद चेन्नई की एक संस्था को दो जोन में पायलट परियोजना के तौर पर निगरानी का काम सौंपा गया। निगम के अनुसार, इस प्रयोग के परिणाम संतोषजनक रहे थे।

    हालांकि, खंडपीठ ने कहा कि अधिकारियों के प्रयासों के बावजूद अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं। अदालत ने कहा कि यही वजह है कि सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति को लेकर बार-बार शिकायतें उसके सामने लाई जा रही हैं।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों अपने वैधानिक दायित्वों का उचित निर्वहन कर रहे हैं या नहीं, यह जांचने के लिए उनके रोजमर्रा के कामकाज की निगरानी करना अदालत की भूमिका नहीं है। इसलिए अदालत ने निगरानी के लिए तीन सामाजिक कार्य संस्थानों को शामिल करने का प्रस्ताव रखा।

    इन संस्थानों में दिल्ली विश्वविद्यालय का सोशल वर्क विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया का कॉलेज ऑफ सोशल वर्क और दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत संचालित अदिति महाविद्यालय शामिल हैं।

    खंडपीठ ने तीनों संस्थानों के प्रमुखों से अनुरोध किया कि वे छात्र-छात्राओं की ऐसी टीमें गठित करें, जिनमें पुरुष और महिला दोनों विद्यार्थी शामिल हों। ये टीमें सार्वजनिक शौचालयों का औचक निरीक्षण करेंगी और उनकी वास्तविक स्थिति का आकलन करेंगी।

    अदालत ने निर्देश दिया कि निरीक्षण के बाद टीमें सुविधाओं की स्थिति दर्शाने वाली तस्वीरों के साथ अपनी रिपोर्ट स्वच्छता की जिम्मेदारी संभालने वाले एडिशनल कमिश्नर को सौंपें।

    खंडपीठ ने कहा,

    “इन रिपोर्टों के आधार पर एडिशनल कमिश्नर मामले में उचित कदम उठाएंगे। यदि किसी प्रकार की चूक सामने आती है तो संबंधित जोन के डिप्टी कमिश्नर को इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा।”

    अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि निरीक्षण करने वाले विद्यार्थियों को मानदेय दिया जाए, ताकि उन्हें आने-जाने, फोटोग्राफी और निरीक्षण से जुड़े अन्य आकस्मिक खर्चों की भरपाई हो सके।

    खंडपीठ ने संकेत दिया कि यदि सार्वजनिक शौचालयों के ढांचागत रखरखाव और स्वच्छता में बार-बार लापरवाही पाई जाती है, तो अधिकारियों को संबंधित डिप्टी कमिश्नर और लॉजिस्टिक सहायता के लिए जिम्मेदार चीफ इंजीनियर के खिलाफ प्रस्तावित कार्रवाई का विवरण देना होगा।

    अदालत ने MCD के अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि इस परियोजना के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में विफलता होती है तो हाईकोर्ट इस पर गंभीरता से विचार करेगा। अधिकारियों के जवाब मिलने के बाद अदालत मामले में उचित आदेश पारित करेगी।

    हाईकोर्ट ने मामले को आगे की सुनवाई के लिए 2 नवंबर को सूचीबद्ध किया।


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