व्यक्तित्व अधिकार के नाम पर व्यंग्य, पैरोडी या कार्टून पर रोक नहीं लगा सकते: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
22 Aug 2026 12:18 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने व्यक्तित्व अधिकारों को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा है कि इन अधिकारों का इस्तेमाल इतना व्यापक नहीं किया जा सकता कि किसी व्यक्ति से जुड़ी गलत गतिविधियों की जानकारी सार्वजनिक करने या कार्टून, व्यंग्य और पैरोडी जैसी अभिव्यक्तियों पर रोक लग जाए। खास तौर पर तब, जब ऐसी अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व या प्रचार अधिकारों के व्यावसायिक इस्तेमाल के दायरे में नहीं आती हो।
जस्टिस अनूप जयराम भंभानी ने यह टिप्पणी शिक्षा क्षेत्र से जुड़े और फिजिक्स वाला के संस्थापक अलख पांडे की ओर से दायर मुकदमे की सुनवाई के दौरान की। पांडे ने विभिन्न ऑनलाइन मंचों पर अपने व्यक्तित्व और प्रचार अधिकारों के कथित उल्लंघन का आरोप लगाया था।
अदालत ने कहा कि मामले में जिस तरह व्यक्तित्व अधिकारों का दावा किया गया है, वह जरूरत से ज्यादा व्यापक हो सकता है और इस वजह से उसके गलत इस्तेमाल की आशंका भी है।
हाईकोर्ट ने अपने एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए कहा कि व्यक्तित्व अधिकारों का इस्तेमाल किसी गलत काम से जुड़ी जानकारी के प्रसार को रोकने या कार्टून, व्यंग्य और पैरोडी जैसी अभिव्यक्ति की पूरी विधा को खत्म करने के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसमें व्यक्ति के व्यक्तित्व या प्रचार अधिकारों का व्यावसायिक शोषण शामिल न हो।
अदालत ने इस स्तर पर अलख पांडे को तीन तरह के कथित उल्लंघनों के संबंध में अंतरिम सुरक्षा देने का फैसला किया। इनमें पांडे को यौन रूप से अश्लील तरीके से पेश करने वाली सामग्री, बिना अनुमति उनके व्यक्तित्व का इस्तेमाल कर आर्थिक लाभ कमाने वाली सामग्री और उनकी पहचान की नकल या उनके नाम से किसी अन्य व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने वाली सामग्री शामिल है।
हाईकोर्ट ने माना कि इन तीनों श्रेणियों के संबंध में पांडे ने प्रथम दृष्टया अपना मामला स्थापित किया।
अदालत ने यह भी माना कि सुविधा का संतुलन उनके पक्ष में है और अंतरिम सुरक्षा नहीं मिलने पर उन्हें ऐसी क्षति हो सकती है, जिसकी भरपाई बाद में मुश्किल होगी। इसी आधार पर अदालत ने कुछ प्रतिवादियों के खिलाफ एकतरफा अंतरिम रोक का आदेश जारी किया।
अदालत ने कई मध्यस्थ मंचों को आपत्तिजनक इंटरनेट लिंक हटाने और कथित आपत्तिजनक खातों तथा सामग्री के पीछे मौजूद लोगों से संबंधित आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पांडे को ऐसी दर्पण वेबसाइटों का पता चलता है, जिन पर संबंधित प्रतिवादी वेबसाइटों की सामग्री के संबंध में उनके कॉपीराइट का उल्लंघन हो रहा है, तो वह शपथपत्र के जरिए संबंधित इंटरनेट सेवा प्रदाता या डोमेन नाम पंजीयक को उन वेबसाइटों का विवरण दे सकते हैं और प्रथम दृष्टया उल्लंघन का प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 79 के तहत सुरक्षित संरक्षण पाने के लिए इंटरनेट सेवा प्रदाता और डोमेन नाम पंजीयक को पूरी तरह निष्पक्ष भूमिका में रहना होगा। उन्हें केवल किसी पक्ष के कहने पर वेबसाइट बंद करने का विवेकाधिकार नहीं दिया जा सकता।
अदालत ने साफ किया कि उसके आदेश में मध्यस्थ संस्थाओं को यह तय करने का अधिकार नहीं दिया गया है कि किसी वेबसाइट को बंद करना है या नहीं। उनकी भूमिका केवल तकनीकी तौर पर यह जांचने तक सीमित है कि जिस वेबसाइट को पांडे ने कथित रूप से अवैध वेबसाइट बताया, वह वास्तव में उन प्रतिवादी वेबसाइटों की दर्पण, समान अक्षर वाली या पुनर्निर्देशित वेबसाइट है या नहीं, जिनके खिलाफ अंतरिम रोक का आदेश जारी किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि तकनीकी जांच में कोई वेबसाइट प्रतिवादी वेबसाइट की दर्पण, समान अक्षर वाली या पुनर्निर्देशित वेबसाइट पाई जाती है, तो संबंधित इंटरनेट सेवा प्रदाता या डोमेन नाम पंजीयक को अदालत द्वारा जारी एकतरफा अंतरिम रोक के आदेश को लागू करना होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि जिस वेबसाइट को स्वयं व्यक्ति ने उचित अनुमति के साथ इस्तेमाल करने का अधिकार दिया हो, उसे बंद कराने की मांग करना तर्कसंगत नहीं होगा। इसलिए अदालत को फिलहाल यह आशंका नहीं दिखती कि पांडे को दी गई इस व्यवस्था का दुरुपयोग किया जाएगा।


