रोज़गार अनुबंध अधिकार का वैध प्रमाण, आविष्कारक की मृत्यु के बाद भी पेटेंट आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
1 Jan 2026 1:10 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने निप्पॉन स्टील कॉरपोरेशन के एक पेटेंट आवेदन खारिज करने वाले पेटेंट ऑफिस का आदेश रद्द कर दिया। यह आवेदन “हाई-स्ट्रेंथ स्टील शीट और उसकी निर्माण विधि” से संबंधित था। अदालत ने स्पष्ट किया कि रोजगार (एम्प्लॉयमेंट) अनुबंध पेटेंट के लिए आवेदन करने के अधिकार का वैध प्रमाण हो सकता है, भले ही संबंधित आविष्कारक का निधन हो चुका हो।
जस्टिस तेजस कारिया ने 24 दिसंबर, 2025 को दिए अपने फैसले में कहा कि पेटेंट ऑफिस ने यह मानकर गंभीर त्रुटि की कि निप्पॉन स्टील अपने “प्रूफ ऑफ राइट” यानी पेटेंट के लिए आवेदन करने के कानूनी अधिकार को स्थापित करने में विफल रहा है। अदालत ने यह भी गलत ठहराया कि रोजगार अनुबंध को ऐसे अधिकार का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि पेटेंट कानून के तहत “प्रूफ ऑफ राइट” का अर्थ ऐसे दस्तावेज़ों से है, जिनसे यह स्पष्ट हो कि आवेदक को पेटेंट के लिए आवेदन करने का वैध अधिकार है। यह अधिकार असाइनमेंट या नियोक्ता-कर्मचारी के बीच हुए रोजगार अनुबंध के माध्यम से भी स्थापित किया जा सकता है।
यह पेटेंट आवेदन जुलाई 2021 में दायर किया गया, जिसमें चार आविष्कारकों के नाम थे। सभी आविष्कारक निप्पॉन स्टील के कर्मचारी थे। सुनवाई के दौरान पेटेंट कार्यालय ने कई आपत्तियां उठाईं, जिनमें एक आपत्ति यह थी कि एक आविष्कारक कोहिची सानो के संबंध में “प्रूफ ऑफ राइट” स्थापित नहीं किया गया, क्योंकि उनका निधन हो चुका था।
निप्पॉन स्टील ने अदालत के समक्ष बताया कि उसने फॉर्म-1 शेष जीवित आविष्कारकों के हस्ताक्षर के साथ दाखिल किया। इसके साथ ही कंपनी ने अपने आंतरिक “बेसिक रेगुलेशंस ऑन इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी” और संबंधित घोषणाएं प्रस्तुत कीं, जिनके अनुसार कर्मचारियों द्वारा सेवा के दौरान विकसित बौद्धिक संपदा का अधिकार कंपनी में निहित होता है। इसके अतिरिक्त, कंपनी ने मृत आविष्कारक के साथ किया गया नियोक्ता-कर्मचारी अनुबंध भी पेश किया, जिसमें स्पष्ट था कि रोजगार के दौरान विकसित आविष्कारों के अधिकार कंपनी को हस्तांतरित होंगे।
इसके बावजूद पेटेंट कार्यालय ने आवेदन खारिज कर दिया। कार्यालय का कहना था कि मृत आविष्कारक के मामले में रोजगार अनुबंध को वैध “प्रूफ ऑफ राइट” नहीं माना जा सकता और उसके कानूनी उत्तराधिकारियों से अलग से असाइनमेंट आवश्यक है। पेटेंट कार्यालय ने पेटेंट प्रदान हो जाने के बाद लागू होने वाले प्रावधानों पर भरोसा किया था।
दिल्ली हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए कहा कि पेटेंट ऑफिस ने पेटेंट दिए जाने के बाद की असाइनमेंट प्रक्रिया को पेटेंट के लिए आवेदन करने के अधिकार से गलत तरीके से जोड़ दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि पेटेंट एक्ट की धारा 68 केवल पेटेंट के अनुदान के बाद लागू होती है और आवेदन के चरण में इसका कोई प्रासंगिक महत्व नहीं है।
अदालत ने कहा कि धारा 7(2) के तहत केवल “पेटेंट के लिए आवेदन करने के अधिकार का प्रमाण” आवश्यक है और नियोक्ता-कर्मचारी अनुबंध, यदि उसे अन्य घोषणाओं और कंपनी की नीतियों के साथ पढ़ा जाए तो यह इस आवश्यकता को पूरा करता है। न्यायालय ने यह भी नोट किया कि निप्पॉन स्टील के अन्य कई पेटेंट आवेदनों में इसी तरह के रोजगार अनुबंध और घोषणाओं को पेटेंट कार्यालय पहले स्वीकार कर चुका है।
इस पृष्ठभूमि में हाईकोर्ट ने पेटेंट ऑफिस का आदेश अस्थिर और कानून के विपरीत करार दिया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले कैलाश बनाम नन्हकू का हवाला देते हुए अदालत ने दोहराया कि प्रक्रिया संबंधी कानूनों का उद्देश्य न्याय को आगे बढ़ाना है, न कि उसे बाधित करना।
अंततः दिल्ली हाईकोर्ट ने पेटेंट अस्वीकृति आदेश रद्द करते हुए पेटेंट ऑफिस को निर्देश दिया कि वह निप्पॉन स्टील के पेटेंट आवेदन पर नए सिरे से विचार करे और कानून के अनुसार उपयुक्त आदेश पारित करे।

