शिकायतकर्ता आरोपी को जबरन नार्को टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

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    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कोई शिकायतकर्ता ऐसे आरोपी को नार्को एनालिसिस टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, जिसने स्पष्ट रूप से इस टेस्ट के लिए सहमति देने से इनकार कर दिया हो।

    जस्टिस पुरुषैंद्र कुमार कौरव ने कहा कि नार्को टेस्ट के लिए सहमति उस व्यक्ति के लिए व्यक्तिगत और गैर-परित्याज्य सुरक्षा है, जिस पर यह परीक्षण किया जाना है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई आरोपी खुद आवेदन देकर भी नार्को टेस्ट कराने का ऐसा अटल अधिकार नहीं रखता, जिसे हर स्थिति में लागू कराया जा सके, तो किसी तीसरे पक्ष यानी शिकायतकर्ता को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह आरोपी की स्पष्ट आपत्ति के बावजूद उसे उसी टेस्ट से गुजरने के लिए मजबूर करे।

    कोर्ट ने यह टिप्पणी 2017 में कथित तौर पर हत्या की गई एक महिला के पिता की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। याचिकाकर्ता ने आरोपी व्यक्तियों का नार्को एनालिसिस टेस्ट कराने का निर्देश देने की मांग की थी। उसने ट्रायल कोर्ट और एडिशनल सेशन जज के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें आरोपी का नार्को टेस्ट कराने की उसकी मांग खारिज कर दी गई।

    मामले के अनुसार मृतका योगेश कुमारी 16 नवंबर 2017 को सब्जी खरीदने के लिए घर से बाहर निकली थी, जिसके बाद वह लापता हो गई। बाद में उसी इलाके में किरायेदार के रूप में रहने वाले कुछ लोगों पर संदेह जताया गया और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 365, 302, 174ए और 34 के तहत FIR दर्ज की गई।

    मृतका के पिता ने ट्रायल कोर्ट का रुख करते हुए आरोपियों का नार्को एनालिसिस टेस्ट कराने का निर्देश देने की मांग की। दो आरोपियों ने ट्रायल कोर्ट के समक्ष स्पष्ट रूप से कहा कि वे यह टेस्ट नहीं कराना चाहते। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने शिकायतकर्ता की अर्जी खारिज करते हुए कहा कि आरोपियों पर ऐसा परीक्षण थोपकर नहीं कराया जा सकता।

    इसके बाद पिता ने सेशन कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी। उनका तर्क था कि जांच कई वर्षों से लंबित है और सच्चाई सामने लाने के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी है। हालांकि, सेशन कोर्ट ने उनकी पुनरीक्षण याचिका खारिज की।

    हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि कथित हत्या एक कमरे के भीतर हुई और लगभग कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। ऐसे में सच्चाई का पता लगाने के लिए नार्को एनालिसिस सहित वैज्ञानिक जांच की अनुमति दी जानी चाहिए।

    हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि अदालत मामले के तथ्यों की गंभीरता से अनभिज्ञ नहीं हो सकती और न ही उस पिता की पीड़ा को नजरअंदाज कर सकती है, जो अपनी बेटी की निर्मम हत्या के बाद न्याय की मांग कर रहा है।

    कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष सुनवाई में आरोपी के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ पीड़ित के हित भी शामिल होते हैं और निष्पक्ष जांच निष्पक्ष सुनवाई का ही एक हिस्सा है। इस सिद्धांत को अदालत पहले ही स्वीकार कर चुकी है।

    हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी को नार्को टेस्ट के लिए मजबूर करने से इनकार करने वाले निचली अदालतों के आदेशों में कोई गैरकानूनीपन, विकृति या अधिकार क्षेत्र से जुड़ी त्रुटि नहीं पाई।

    कोर्ट ने कहा कि जिन आरोपियों ने स्पष्ट रूप से नार्को एनालिसिस टेस्ट कराने से इनकार किया, उन्हें शिकायतकर्ता की मांग पर इस टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह निष्कर्ष सुप्रीम कोर्ट द्वारा सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में तय किए गए बाध्यकारी कानून के अनुरूप है और बाद के अमलेश कुमार मामले में भी इसे दोहराया गया।

    सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2010 में कहा कि किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध नार्को एनालिसिस, पॉलीग्राफ या ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत मामले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि आरोपी की स्पष्ट असहमति के बावजूद उसे नार्को टेस्ट कराने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

    हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में आरोपपत्र पहले ही दाखिल किया जा चुका है। इसलिए संबंधित अदालत को मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने की स्वतंत्रता दी गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता चाहे तो आगे की जांच या जांच की निगरानी के लिए संबंधित अदालत का रुख कर सकता है।

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