नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को जबरन गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

15 Sept 2026 1:49 PM IST

  • नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को जबरन गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता को गर्भ जारी रखने और बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। महिला के अपने शरीर से जुड़े अधिकार में यह तय करने का अधिकार भी शामिल है कि वह मां बनना चाहती है या नहीं।

    कोर्ट ने करीब 30 सप्ताह 5 दिन के गर्भ वाली 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को मेडिकल प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन की अनुमति देते हुए ये महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं।

    जस्टिस मधु जैन ने कहा कि यौन हिंसा के मामले में पीड़िता को अपनी इच्छा के विरुद्ध गर्भ जारी रखने और मातृत्व की जिम्मेदारी उठाने के लिए मजबूर करना उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का गंभीर हनन होगा।

    कोर्ट ने कहा कि यौन हिंसा के परिणामस्वरूप ठहरे गर्भ को जारी रखने और बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किए जाने से पीड़िता को लंबे समय तक शारीरिक और मानसिक आघात से गुजरना पड़ सकता है।

    मामले में नाबालिग ने अपने अभिभावक के माध्यम से गर्भसमापन की अनुमति के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। दावा है कि गर्भ यौन हिंसा के कारण ठहरा है।

    लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और श्रीमती एसके अस्पताल में गठित मेडिकल बोर्ड ने गर्भ की अवधि करीब 30 सप्ताह 5 दिन आंकी है।

    कोर्ट ने शुरुआत में ध्यान दिलाया कि मेडिकल प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन एक्ट के तहत सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह से अधिक और 24 सप्ताह तक के गर्भ के मेडिकल टर्मिनेशन की कुछ विशेष श्रेणियों में अनुमति है। इनमें दुष्कर्म या यौन हिंसा की पीड़िताएं और नियमों के तहत नाबालिग भी शामिल हैं। हालांकि, इस मामले में गर्भ निर्धारित वैधानिक अवधि से आगे बढ़ चुका था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि गर्भ की अवधि निर्धारित सीमा से अधिक हो जाना संवैधानिक अधिकारों पर विचार करते समय अकेले निर्णायक आधार नहीं हो सकता।

    अदालत को प्रत्येक मामले की विशेष परिस्थितियों के साथ नाबालिग के मौलिक अधिकारों पर भी विचार करना होगा। इनमें गरिमा, शारीरिक स्वायत्तता, प्रजनन संबंधी निर्णय लेने का अधिकार और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य शामिल हैं।

    जस्टिस मधु जैन ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 या 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय संवैधानिक अदालतों को नाबालिग मां बनने वाली बच्ची के सर्वोत्तम हित और कल्याण को प्राथमिकता देनी चाहिए।

    साथ ही मेडिकल प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन कानून में निर्धारित व्यवस्था का भी ध्यान रखना होगा।

    कोर्ट ने कहा कि मौजूदा मामले के तथ्यों में मेडिकल प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन एक्ट में निर्धारित गर्भ अवधि की सीमा हाईकोर्ट के संवैधानिक अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल पर पूर्ण रोक नहीं बन सकती।

    15 वर्षीय बच्ची है, गर्भ कथित यौन हिंसा का परिणाम है और उसने स्वयं गर्भसमापन की इच्छा व्यक्त की है। हालांकि गर्भ की अधिक अवधि के कारण मेडिकल सावधानी जरूरी है, लेकिन इसके आधार पर बच्ची के शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और प्रजनन संबंधी निर्णय के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने साथ ही स्पष्ट किया कि गर्भसमापन की प्रक्रिया तभी की जाएगी जब मेडिकल जांच में बच्ची को इसके लिए शारीरिक रूप से सक्षम पाया जाए और सभी जरूरी मेडिकल सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएं।

    मामले से अलग होते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत इस तथ्य से नजर नहीं हटा सकती कि याचिकाकर्ता सबसे पहले एक बच्ची और दुष्कर्म की पीड़िता है।

    कोर्ट ने कहा कि गर्भ कथित अपराध का परिणाम है और इसे बच्ची के बचपन को परिभाषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    अदालत ने कहा कि केवल इसलिए कि यौन हिंसा के परिणामस्वरूप बच्ची गर्भवती हुई है, 15 वर्षीय बच्ची को केवल “मां” की पहचान तक सीमित नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि नाबालिग ने अपने माता-पिता दोनों को खो दिया है जिससे उसकी परिस्थितियां और कठिन हो गई।

    हाईकोर्ट ने कहा कि कानून उपचार और प्रक्रियाएं उपलब्ध करा सकता है, लेकिन अदालत का कोई आदेश उस आघात को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता जिसे बच्ची ने झेला है।

    हालांकि, अदालत यह सुनिश्चित कर सकती है कि ऐसे बेहद संवेदनशील समय में उसे और कठिनाई के बजाय देखभाल, गरिमा, संवेदनशीलता और कानून का संरक्षण मिले।

    कोर्ट ने उम्मीद जताई कि बच्ची को हर संभव सहायता, देखभाल और सुरक्षा दी जाएगी, ताकि परिस्थितियों के बावजूद उसे अपना बचपन और वह गरिमा वापस पाने का अवसर मिले, जिससे किसी भी बच्चे को वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

    हाईकोर्ट ने लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज और श्रीमती एसके अस्पताल को निर्देश दिया कि बच्ची को चिकित्सकीय रूप से प्रक्रिया के लिए उपयुक्त पाए जाने पर जल्द से जल्द गर्भसमापन की व्यवस्था की जाए। प्रक्रिया सक्षम डॉक्टरों द्वारा मेडिकल प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन एक्ट, संबंधित नियमों और लागू चिकित्सकीय दिशा-निर्देशों के अनुसार की जाएगी।

    अदालत ने कथित यौन अपराध से जुड़े आपराधिक मामले में डीएनए पहचान और अन्य आवश्यक उद्देश्यों के लिए ऊतक या भ्रूण संबंधी सामग्री सुरक्षित रखने का भी निर्देश दिया।

    गर्भसमापन की प्रक्रिया, दवाओं, जांच, अस्पताल में भर्ती, भोजन और अन्य आवश्यक मेडिकल खर्च सहित सभी खर्च राज्य सरकार को वहन करने का निर्देश दिया गया।

    हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि मेडिकल प्रक्रिया के बावजूद बच्चा जीवित पैदा होता है तो उसके उपचार और देखभाल के लिए सभी उचित और मेडिकल रूप से संभव कदम उठाए जाएं। इसके बाद बाल कल्याण समिति कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई करेगी।

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