गर्भपात के लिए 24 सप्ताह की सीमा ही अंतिम आधार नहीं, महिला के अधिकारों और परिस्थितियों पर भी विचार जरूरी: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 Oct 2026 3:29 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी के मामले में केवल मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत निर्धारित 24 सप्ताह की सीमा के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता। प्रत्येक मामले में संबंधित महिला की उम्र, गर्भधारण की परिस्थितियों, मेडिकल राय और उसके अधिकारों व हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना जरूरी है।
जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने यह टिप्पणी 17 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता की याचिका स्वीकार करते हुए की। पीड़िता की गर्भावस्था 29 सप्ताह से अधिक की हो चुकी है। उसने अपनी नानी के माध्यम से अदालत में याचिका दायर कर गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी।
याचिका में कहा गया कि नाबालिग दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई और गर्भावस्था जारी रहने से उसे गंभीर मानसिक आघात तथा मनोवैज्ञानिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। इस घटना के संबंध में दिल्ली के ख्याला थाने में प्राथमिकी भी दर्ज कराई गई।
अदालत ने कहा कि गर्भावस्था समाप्त करने का प्रश्न केवल कानून में निर्धारित 24 सप्ताह की अवधि तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। इसके बजाय हर मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर विचार करना होगा। इसमें गर्भवती महिला की उम्र, गर्भधारण के कारण रिकॉर्ड पर उपलब्ध मेडिकल राय और उसके अधिकारों तथा हितों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
मामले में दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में गठित मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नाबालिग मेडिकल और मनोवैज्ञानिक रूप से गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया के लिए उपयुक्त है। अदालत ने मेडिकल बोर्ड की राय और मामले की विशेष परिस्थितियों पर विचार करने के बाद याचिका स्वीकार की।
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता लगभग 17 वर्ष की नाबालिग है और उसकी गर्भावस्था अवांछित बताई गई। यह गर्भावस्था कथित दुष्कर्म के कारण हुई, जिसके संबंध में पहले ही FIR दर्ज की जा चुकी है। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार गर्भावस्था की अवधि 29 सप्ताह से अधिक हो चुकी थी।
अदालत ने निर्देश दिया कि गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया MTP Act तथा लागू नियमों, विनियमों और दिशानिर्देशों के अनुसार सक्षम डॉक्टरों की टीम द्वारा की जाए। मेडिकल बोर्ड को पूरी प्रक्रिया का विस्तृत रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया गया।
अदालत ने अस्पताल को आपराधिक मामले में DNA टेस्ट के उद्देश्य से भ्रूण के ऊतक सुरक्षित रखने का निर्देश दिया ताकि जरूरत पड़ने पर जांच में उनका इस्तेमाल किया जा सके।
पीठ ने स्पष्ट किया कि नाबालिग की गर्भावस्था समाप्त कराने और इस दौरान अस्पताल में उसके रहने से संबंधित सभी आवश्यक खर्च राज्य सरकार वहन करेगी। प्रक्रिया के बाद की देखभाल और उपचार पर होने वाला खर्च भी राज्य सरकार को ही उठाना होगा।
हाईकोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि प्रक्रिया के दौरान बच्चा जीवित पैदा होता है तो अस्पताल और राज्य के संबंधित अधिकारी उसकी मेडिकल देखभाल तथा आवश्यक सहायता सुनिश्चित करें। इसमें इनक्यूबेटर जैसी जरूरी मेडिकल सुविधाएं उपलब्ध कराना भी शामिल होगा। ऐसी स्थिति में संबंधित बाल कल्याण समिति को भी सूचित किया जाना चाहिए।
अदालत ने नाबालिग पीड़िता की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखने का आदेश दिया। उसके नाम, पते, तस्वीरों, चिकित्सकीय रिकॉर्ड या पहचान उजागर करने वाली किसी भी अन्य जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, सिवाय उन परिस्थितियों के जहां कानून इसकी अनुमति देता हो या ऐसा करना कानूनी रूप से आवश्यक हो।
इस प्रकार दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि गर्भावस्था की अवधि महत्वपूर्ण होने के बावजूद चिकित्सकीय गर्भसमापन से जुड़े मामलों में निर्णय लेते समय महिला की परिस्थितियों, मेडिकल संबंधी निष्कर्षों और उसके अधिकारों पर समग्र रूप से विचार करना आवश्यक है।

