विशेष विवाह अधिनियम में तलाक याचिका के लिए एक वर्ष की प्रतीक्षा अवधि असाधारण परिस्थितियों में माफ की जा सकती है: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

2 Jun 2026 12:45 PM IST

  • विशेष विवाह अधिनियम में तलाक याचिका के लिए एक वर्ष की प्रतीक्षा अवधि असाधारण परिस्थितियों में माफ की जा सकती है: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (Special Marriage Act) के तहत तलाक की याचिका दाखिल करने से पहले निर्धारित एक वर्ष की अनिवार्य प्रतीक्षा अवधि को असाधारण परिस्थितियों में माफ किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि यदि वैवाहिक संबंध केवल औपचारिक रूप से अस्तित्व में हो, उसका कभी वास्तविक निर्वहन न हुआ हो और विवाह जारी रखने से पक्षकारों की कठिनाइयां ही बढ़ें, तो अदालत इस अवधि में छूट दे सकती है।

    जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने पति की अपील स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट का वह आदेश रद्द किया, जिसमें एक वर्ष की वैधानिक अवधि और अन्य अनिवार्य समय-सीमा में छूट देने से इनकार किया गया था।

    मामला अलग-अलग धर्मों से संबंध रखने वाले एक दंपति का था, जिन्होंने 25 अगस्त 2025 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया था। अदालत को बताया गया कि विवाह की जानकारी सामने आने के बाद दोनों परिवारों में गंभीर तनाव पैदा हो गया। पति ने कहा कि विवाह की खबर सुनकर उसके पिता को गहरा सदमा लगा और बाद में उनमें यकृत संबंधी गंभीर बीमारी का पता चला। वहीं पत्नी ने आशंका जताई कि यदि उसके परिवार को विवाह की जानकारी हुई तो उसके साथ भी गंभीर पारिवारिक परिणाम हो सकते हैं, इसलिए उसने यह बात अपने परिजनों से छिपाकर रखी।

    दंपति ने अदालत को बताया कि विवाह के बाद वे कभी साथ नहीं रहे, वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं हुए और न ही विवाह को सामाजिक या पारिवारिक स्वीकृति मिली। उनके कोई संतान भी नहीं है।

    फैमिली कोर्ट ने यह कहते हुए छूट देने से इनकार किया था कि मामले में ऐसी कोई असाधारण कठिनाई नहीं दिखाई देती और दंपति ने विवाह बचाने का पर्याप्त प्रयास भी नहीं किया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष से असहमति जताई। अदालत ने कहा कि विशेष विवाह अधिनियम की समय-सीमाएं विवाह संस्था की सुरक्षा के लिए बनाई गईं, लेकिन कानून अदालतों को उपयुक्त मामलों में इन शर्तों में राहत देने का अधिकार भी देता है।

    खंडपीठ ने कहा,

    "यह निर्विवाद है कि पक्षकारों का विवाह केवल औपचारिक था। वे कभी साथ नहीं रहे, वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं हुए और न ही विवाह को सामाजिक या पारिवारिक मान्यता मिली। ऐसी परिस्थितियां तथा परिवारों में उत्पन्न गंभीर तनाव और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं कानून के तहत 'असाधारण कठिनाई' की श्रेणी में आती हैं।"

    अदालत ने आगे कहा कि जब दोनों पक्ष विवाह समाप्त करने पर सहमत हैं, तब एक वर्ष की अवधि पूरी होने की प्रतीक्षा करवाने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं है। ऐसा करना केवल उनकी पीड़ा और कठिनाइयों को बढ़ाने जैसा होगा, जो कानून की मंशा के विपरीत है।

    हाईकोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट ने कानून की अत्यधिक संकीर्ण और तकनीकी व्याख्या की थी। इसी आधार पर अदालत ने उसका आदेश रद्द किया और निर्देश दिया कि फैमिली कोर्ट एक वर्ष की वैधानिक अवधि पूरी होने की शर्त लगाए बिना आपसी सहमति से तलाक की याचिका पर सुनवाई करे।

    यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां विवाह केवल कागजी रूप से अस्तित्व में रह गया हो और उसे बनाए रखने से पक्षकारों को अनावश्यक मानसिक, सामाजिक या पारिवारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा हो।

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