सामाजिक दबाव में युवती ने बदला बयान, सहमति से बने अंतरधार्मिक संबंध को अपराध नहीं माना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

21 May 2026 11:32 AM IST

  • सामाजिक दबाव में युवती ने बदला बयान, सहमति से बने अंतरधार्मिक संबंध को अपराध नहीं माना जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2004 के अपहरण और दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि युवती आरोपी के साथ अपनी इच्छा से गई थी, उसने विशेष विवाह अधिनियम के तहत उससे शादी की थी और बाद में सामाजिक तथा पारिवारिक दबाव के कारण अपना रुख बदल लिया।

    जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि भारतीय समाज आज भी धर्म, जाति, क्षेत्र और भाषा के आधार पर गहरे विभाजन से ग्रस्त है, जहां युवाओं के लिए अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनना बेहद कठिन बना हुआ है।

    अदालत ने कहा,

    “यदि समाज द्वारा तय सीमाओं को तोड़ा जाता है, तो इसके परिणाम इतने गंभीर होते हैं कि कई बार लोगों को अपनी जान तक गंवानी पड़ती है। ऐसे विभाजित समाज में अंतरधार्मिक संबंध को लगभग अपराध की तरह देखा जाता है।”

    मामले में मोहम्मद कासिम ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को चुनौती दी थी। उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 363, 366 और 376 के तहत दोषी ठहराया गया था।

    यह मामला युवती के पिता की शिकायत पर दर्ज किया गया था, जिसमें आरोप लगाया गया था कि आरोपी नाबालिग युवती को बहला-फुसलाकर पश्चिम बंगाल ले गया और उसके साथ दुष्कर्म किया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि युवती ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 और 164 के तहत दिए गए शुरुआती बयानों में आरोपी का समर्थन किया था।

    अदालत ने कहा कि युवती अपनी मर्जी से आरोपी के साथ दिल्ली से पश्चिम बंगाल गई, उससे विवाह किया और करीब दो महीने तक उसके साथ रही।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों ने 1500 किलोमीटर से अधिक की यात्रा सार्वजनिक परिवहन के जरिए की थी। इस दौरान युवती के पास कई मौके थे, जब वह मदद मांग सकती थी या शोर मचा सकती थी।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “यह मानना लगभग असंभव है कि युवती को एक भी ऐसा अवसर नहीं मिला होगा, जब वह पुलिस, सरकारी अधिकारियों या आम लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकती।”

    जस्टिस यादव ने कहा कि पूरी यात्रा के दौरान युवती का शांत रहना यह दर्शाता है कि वह आरोपी के साथ स्वेच्छा से गई थी।

    अदालत ने युवती द्वारा आरोपी को लिखे गए कथित पत्रों और विशेष विवाह अधिनियम के तहत जारी विवाह प्रमाणपत्र पर भी भरोसा किया।

    युवती की उम्र के मुद्दे पर हाइकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों और संभावित त्रुटि की सीमा को देखते हुए उसकी उम्र 18 वर्ष मानी जा सकती है।

    अदालत ने कहा कि इस उम्र में कोई महिला अपनी पसंद से विवाह कर सकती है और सहमति से संबंध भी बना सकती है।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बाद में अदालत में गवाही देते समय युवती ने अपना पूरा दोष आरोपी पर डाल दिया, जो उसके पहले दिए गए बयानों से अलग था। अदालत के अनुसार यह बदलाव सामाजिक और पारिवारिक दबाव का परिणाम प्रतीत होता है।

    इन टिप्पणियों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।

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