अंतरदेशीय गोद लेने की प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, CARA को अपात्र परिवारों को बच्चों के रेफरल रोकने और जवाबदेही तय करने के निर्देश

  • अंतरदेशीय गोद लेने की प्रक्रिया में गड़बड़ियों पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, CARA को अपात्र परिवारों को बच्चों के रेफरल रोकने और जवाबदेही तय करने के निर्देश

    दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरदेशीय दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में प्रशासनिक लापरवाही, ऑनलाइन पोर्टल की खामियों और अपात्र भावी दत्तक माता-पिता को बच्चों के रेफरल दिए जाने पर केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) को कई निर्देश जारी किए।

    जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने प्राधिकरण को निर्देश दिया कि वह पंजीकरण के समय, होम स्टडी रिपोर्ट के दोबारा सत्यापन के दौरान और किसी बच्चे को गोद लेने के लिए रेफर करने से पहले भावी दत्तक माता-पिता की पात्रता की जांच सुनिश्चित करे।

    अदालत ने यह भी कहा कि ऑनलाइन पोर्टल को इस तरह व्यवस्थित किया जाए कि कानूनी पात्रता के मानदंडों के विपरीत रेफरल जारी न हो सकें और CARINGS पोर्टल से मिशन वात्सल्य पोर्टल पर डेटा स्थानांतरित किए जाने से प्रभावित प्रोफाइल का ऑडिट किया जाए।

    हाईकोर्ट ने सिंगापुर में रहने वाले एक भावी दत्तक पिता की याचिका खारिज करते हुए ये निर्देश दिए।

    याचिकाकर्ता ने CARA की ओर से गोद लेने के लिए रेफर की गई एक बच्ची को गोद लेने की मांग की थी, जबकि दत्तक ग्रहण विनियम, 2022 के तहत उसका परिवार सामान्य श्रेणी के बच्चे को गोद लेने के लिए पात्र नहीं था।

    अदालत ने कहा कि CARA की प्रशासनिक लापरवाही और अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी करने में हुई देरी की कड़ी आलोचना की जानी चाहिए, लेकिन इन खामियों के आधार पर कानूनी पात्रता की शर्तों को दरकिनार नहीं किया जा सकता और न ही किसी व्यक्ति को किसी खास बच्चे को गोद लेने का कानूनी रूप से लागू किया जा सकने वाला अधिकार मिल जाता है।

    याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी ने दिसंबर 2020 में भावी दत्तक माता-पिता के रूप में पंजीकरण कराया था। उस समय उनके एक जैविक बच्चे थे। मार्च 2022 में उनके दूसरे बेटे का जन्म हुआ। सितंबर 2025 में उनकी होम स्टडी रिपोर्ट का दोबारा सत्यापन किया गया, जिसमें उनके दो जैविक बेटों का उल्लेख था। इसके बावजूद CARA ने जनवरी 2026 में उन्हें नवंबर 2025 में जन्मी एक परित्यक्त बच्ची को गोद लेने के लिए रेफर कर दिया। याचिकाकर्ता ने इस रेफरल को स्वीकार किया और बाद में बच्ची से मिलने भी गया।

    हालांकि, मार्च में दत्तक ग्रहण पोर्टल पर उनकी आवेदन स्थिति “आवेदन अस्वीकृत वापस लिया गया दिखाई देने लगी, जबकि याचिकाकर्ता ने अपना आवेदन वापस नहीं लिया। इसके बाद CARA ने उन्हें बताया कि वे सामान्य श्रेणी के बच्चे को गोद लेने के लिए पात्र नहीं हैं। इसी घटनाक्रम के बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल रेफरल या NOC जारी करने में प्रशासनिक देरी होने के कारण बच्ची को विशेष जरूरतों वाली या गोद लेने के लिए कठिन श्रेणी में आने वाली बच्ची नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया या मुकदमेबाजी के कारण हुई देरी को किसी बच्चे को इस श्रेणी में शामिल करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी बच्चे का रेफरल जारी होना या भावी दत्तक माता-पिता द्वारा उसे स्वीकार कर लेना, गोद लेने का कोई स्थायी या कानूनी रूप से लागू कराया जा सकने वाला अधिकार पैदा नहीं करता, खासकर तब जब संबंधित परिवार सामान्य श्रेणी के बच्चे को गोद लेने के लिए निर्धारित कानूनी पात्रता पूरी नहीं करता हो।

    अदालत ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि CARA द्वारा NOC जारी करने में देरी के कारण उसे स्वतः स्वीकृत मान लिया जाना चाहिए।

    जस्टिस शर्मा ने कहा कि निर्धारित समय-सीमा का अर्थ यह नहीं लगाया जा सकता कि पात्रता की शर्तें पूरी नहीं होने के बावजूद NOC जारी करना अनिवार्य हो जाए।

    बच्चे के सर्वोत्तम हित को सर्वोपरि बताते हुए अदालत ने कहा कि गलत रेफरल के कारण भावी दत्तक माता-पिता का बच्चे से भावनात्मक जुड़ाव हो जाना कानूनी आवश्यकताओं को पीछे नहीं कर सकता। ऐसा करना गोद लेने की प्रतीक्षा कर रहे अन्य परिवारों के साथ निष्पक्षता के सिद्धांत को भी प्रभावित कर सकता है।

    हाईकोर्ट ने CARA को पात्रता की जांच और नियमों के अनुरूप रेफरल सुनिश्चित करने के अलावा दत्तक ग्रहण विनियम, 2022 के विनियम 17(1) के तहत NOC जारी करने की निर्धारित समय-सीमा का पालन करने का निर्देश दिया।

    अदालत ने कहा कि यदि जरूरी दस्तावेजों में कमी के कारण NOC की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती, तो CARA को संबंधित भावी दत्तक माता-पिता और, जहां लागू हो, अधिकृत एजेंसी या अंतरदेशीय दत्तक ग्रहण से जुड़े मध्यस्थ को लिखित रूप में कमियों की जानकारी देनी होगी।

    अदालत ने प्राथमिकता के आधार पर एक ही समेकित सूचना के माध्यम से सभी कमियां बताने का सुझाव भी दिया।

    अदालत ने CARA को आवेदन खारिज करने या बंद करने के कारण स्पष्ट करने, मामले में हुई प्रशासनिक चूकों की जांच करने और जहां जरूरी हो, जिम्मेदारी तय करने का निर्देश दिया।

    जस्टिस शर्मा ने कहा कि प्राधिकरण इस मामले में सामने आई खामियों की जांच करे, उचित सुधारात्मक कदम उठाए और आवश्यकतानुसार जवाबदेही तय करे।

    इसके साथ ही पात्रता सत्यापन, रेफरल, NOC और शिकायतों से निपटने वाले अधिकारियों व कर्मचारियों के लिए जरूरी निर्देश और मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOP) जारी की जाएं तथा उन्हें इन निर्देशों के अनुपालन के प्रति संवेदनशील बनाया जाए।

    हाईकोर्ट ने अंतरिम यथास्थिति आदेश को भी समाप्त कर दिया और CARA को निर्देश दिया कि वह बच्ची को कानून के अनुसार गोद दिए जाने की प्रक्रिया के लिए तत्काल कदम उठाए।

    याचिका खारिज करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके फैसले का अर्थ याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी की नीयत या उनकी उपयुक्तता पर सवाल उठाना नहीं है।

    अदालत ने उम्मीद जताई कि उन्हें भविष्य में किसी ऐसे बच्चे को परिवार देने का अवसर मिल सकता है, जिसे परिवार की जरूरत है, जिसमें विशेष जरूरतों वाला बच्चा भी शामिल हो सकता है।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “इसके पोर्टल पर दर्ज हर प्रोफाइल के पीछे एक ऐसा परिवार है, जो बच्चे की प्रतीक्षा कर रहा है, और एक ऐसा बच्चा है, जो परिवार की प्रतीक्षा कर रहा है।”

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