पुजारी ने मंदिर की पवित्रता और लोगों के विश्वास को तार-तार किया: दिल्ली हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में दोषसिद्धि बरकरार रखी
Amir Ahmad
15 July 2026 1:00 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने बौद्धिक रूप से दिव्यांग महिला से दुष्कर्म के मामले में मंदिर के पुजारी की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसके कृत्य को शैतानी और अपवित्र बताया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी ने न केवल पीड़िता की गरिमा को ठेस पहुंचाई, बल्कि मंदिर की पवित्रता, धार्मिक आस्था और पुजारी पर लोगों के विश्वास को भी गहरा आघात पहुंचाया।
जस्टिस विमल कुमार यादव ने दोषी की अपील खारिज करते हुए कहा कि शुरुआत में पीड़िता के परिवार ने अपनी धार्मिक आस्था और आरोपी के मंदिर छोड़ने के वादे पर भरोसा करते हुए मामले को दबाने की कोशिश की थी। लेकिन जब आरोपी अपने वादे से मुकर गया और दोबारा इलाके में लौट आया, तब परिवार ने पुलिस का रुख किया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा,
"इस मामले में आरोपी के कृत्य ने मंदिर की पवित्रता, धार्मिक विश्वास, पुजारी पद की गरिमा और लोगों के भरोसे को पूरी तरह से चकनाचूर कर दिया।"
यह मामला 30 जनवरी 2013 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपील से जुड़ा था, जिसमें आरोपी पुजारी को दिल्ली स्थित एक मंदिर के आवासीय परिसर में बौद्धिक रूप से दिव्यांग महिला से दुष्कर्म का दोषी ठहराया गया।
आरोपी ने अपनी अपील में FIR दर्ज कराने में 40 दिन की देरी, चिकित्सीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों के अभाव, अभियोजन की कहानी में कथित विरोधाभास तथा जांच में खामियों का हवाला देकर दोषसिद्धि को चुनौती दी थी।
अभियोजन के अनुसार 4 फरवरी 2010 को पीड़िता अपनी चचेरी बहन के साथ मंदिर गई। आरोप है कि पुजारी ने उसे खाना बनाने के बहाने बुलाया और बाद में मंदिर के आवासीय हिस्से के एक कमरे में ले जाकर उसके साथ दुष्कर्म किया। पीड़िता ने उसी दिन अपनी मां को घटना की जानकारी दी, लेकिन परिवार ने तत्काल पुलिस में शिकायत दर्ज नहीं कराई।
हाईकोर्ट ने कहा कि घटना के समय पीड़िता की उम्र करीब 30 वर्ष है, लेकिन उसका बौद्धिक स्तर सामान्य से कम है और उसका बौद्धिक स्तर (आईक्यू) 60 है। कोर्ट ने मेडिकल गवाही का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे व्यक्ति सामान्यतः सरल स्वभाव के होते हैं और उन्हें आसानी से बहकाया जा सकता है।
FIR दर्ज कराने में देरी के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि मामले की परिस्थितियां इस देरी को पूरी तरह स्पष्ट करती हैं। घटना मंदिर परिसर में हुई और आरोपी पुजारी है। ऐसे में सामाजिक बदनामी, परिवार की प्रतिष्ठा और पीड़िता के भविष्य को लेकर उसके माता-पिता स्वाभाविक रूप से चिंतित है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि शुरुआत में पीड़िता की मां ने आरोपी के माफी मांगने और हमेशा के लिए मंदिर छोड़ने के वादे पर उसे माफ कर दिया। लेकिन जब कुछ समय बाद आरोपी फिर उसी इलाके में दिखाई दिया, तब पीड़िता के भाई से उसका विवाद हुआ और इसके बाद पुलिस तक मामला पहुंचा।
हाईकोर्ट ने माना कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी से आरोपी को कोई लाभ या हानि नहीं हुई। इसके विपरीत, इससे अभियोजन पक्ष के चिकित्सीय और वैज्ञानिक साक्ष्य कमजोर पड़ गए, क्योंकि यदि शिकायत तुरंत दर्ज होती तो अधिक मजबूत साक्ष्य उपलब्ध हो सकते थे।
कोर्ट ने कहा कि भले ही वैज्ञानिक साक्ष्य निर्णायक नहीं थे, लेकिन मेडिकल जांच में मिले निष्कर्ष और पीड़िता की विश्वसनीय गवाही अभियोजन के पक्ष की पुष्टि करते हैं।
आरोपी की इस दलील को भी कोर्ट ने खारिज कर दिया कि दिन के समय मंदिर में ऐसा अपराध होना संभव नहीं। कोर्ट ने कहा कि दोपहर के समय मंदिर सामान्यतः सुनसान रहते हैं और पीड़िता का घटनाक्रम मंदिर परिसर की बनावट के अनुरूप है।
साथ ही कोर्ट ने कहा कि बौद्धिक रूप से दिव्यांग व्यक्ति की गवाही में मामूली असंगतियों को अभियोजन के लिए घातक नहीं माना जा सकता।
हालांकि, अपने फैसले में जस्टिस विमल कुमार यादव ने कार्ल मार्क्स के उस प्रसिद्ध कथन का भी उल्लेख किया कि धर्म जनता के लिए अफीम है लेकिन कहा कि इस मामले में बेटी के साथ हुए अपराध और आरोपी के विश्वासघात ने पीड़िता के परिवार को वास्तविकता का एहसास करा दिया।


