OCI कार्ड मामले में सिद्धार्थ वरदराजन को झटका, हाईकोर्ट ने राहत देने वाला आदेश लिया वापस
Amir Ahmad
14 May 2026 1:25 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने 'द वायर' के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन को OCI कार्ड मामले में कड़ी फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अदालत से महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने वरदराजन को अपने आचरण पर स्पष्टीकरण देने के लिए शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही अदालत ने अपना वह पुराना आदेश भी वापस ले लिया, जिसमें केंद्र सरकार द्वारा उनके PIO कार्ड को OCI कार्ड में बदलने से इनकार करने का फैसला रद्द किया गया था।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और एडवोकेट आशीष दीक्षित ने कहा कि पिछली सुनवाई के बाद कुछ चिंताजनक तथ्य सामने आए।
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि वर्ष 2020 में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा वरदराजन को दी गई जमानत के आदेश में स्पष्ट शर्तें लगाई गई थीं। इन शर्तों के अनुसार उन्हें मुकदमे की अवधि के दौरान बिना ट्रायल कोर्ट की अनुमति के भारत छोड़ने की अनुमति नहीं थी और अपना पासपोर्ट भी ट्रायल कोर्ट में जमा कराना था।
सरकार की ओर से कहा गया कि इस आदेश को सुविधाजनक तरीके से अदालत से छिपाया गया।
वरदराजन की ओर से सीनियर एडवोकेट नित्या रामकृष्णन ने कहा कि यह तथ्य उनके ध्यान से छूट गया था और इसे जानबूझकर नहीं छिपाया गया।
इस पर अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा,
“हमें यह परखना होगा कि आप वास्तव में इस आदेश को भूल गए या नहीं। यदि इस तरह की माफी स्वीकार की गई तो अदालत में गंभीर स्थिति पैदा होगी। अदालत हमेशा मानती है कि याचिकाकर्ता पूर्ण तथ्यों के साथ उसके सामने आया है। अपने आचरण को शपथपत्र के जरिए स्पष्ट कीजिए।”
अदालत ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद कहा कि याचिका में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत देते समय उन पर बाध्यकारी शर्तें लगाई थीं। अदालत के अनुसार यह तथ्य ईमानदारी से बताना आवश्यक था।
हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि यदि कोई पक्षकार महत्वपूर्ण तथ्य छिपाता है तो सामान्यतः वह अदालत से राहत पाने का अधिकार खो देता है। यह सिद्धांत अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए विकसित किया गया।
अदालत ने कहा,
“याचिकाकर्ता प्रथम दृष्टया महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने का दोषी प्रतीत होता है। हालांकि, सीनियर एडवोकेट ने परिस्थितियों को स्पष्ट करने की कोशिश की, लेकिन अदालत उचित समझती है कि याचिकाकर्ता को नोटिस जारी कर शपथपत्र दाखिल करने का अवसर दिया जाए।”
इसके साथ ही अदालत ने मामले में पहले पारित आदेशों को वापस लेते हुए याचिका को फिर से मूल स्थिति में बहाल कर दिया। मामले की अगली सुनवाई इसी महीने बाद में होगी।

