फर्जी विश्वविद्यालयों पर सख्ती जरूरी, भविष्य में AI संस्थानों का भी खतरा : दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
20 May 2026 6:08 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने देशभर में तेजी से बढ़ रहे फर्जी उच्च शिक्षण संस्थानों पर गंभीर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, दिल्ली सरकार और अन्य संबंधित प्राधिकरणों से पूछा कि ऐसे संस्थानों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई की गई।
चीफ जस्टिस डी.के. उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें देशभर में फर्जी विश्वविद्यालयों के बढ़ते जाल और नियामक संस्थाओं की कथित विफलता का मुद्दा उठाया गया।
अदालत ने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा से कहा कि वह शिक्षा विभागों का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर आकर्षित करें और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करें।
अदालत ने कहा,
“ऐसे संस्थानों में पढ़ने वाले छात्र अपना समय, मेहनत और पैसा बर्बाद कर देते हैं, क्योंकि अंत में उन्हें ऐसी डिग्रियां मिलती हैं, जिनसे रोजगार नहीं मिलता।”
सुनवाई के दौरान अदालत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे संस्थानों के जाल में अधिकतर छोटे कस्बों और ग्रामीण इलाकों के छात्र फंस जाते हैं, जो अपनी सीमित आर्थिक क्षमता के बावजूद बड़े सपने लेकर शहरों में पढ़ने आते हैं।
इस पर एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि इस समस्या पर कड़ी कार्रवाई की जरूरत है और जनहित याचिका का दायरा बढ़ाकर मेडिकल, लॉ और अन्य पेशेवर पाठ्यक्रमों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा,
“फर्जी मेडिकल डिग्री और नकली कानून की डिग्रियों का भी खतरा है। यह बहुआयामी समस्या है। भविष्य में तो AI का खतरा भी सामने आएगा।”
यह जनहित याचिका वकील शशांक देव सुधी ने दायर की। याचिका में फर्जी विश्वविद्यालयों के रूप में काम कर रहे संस्थानों की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) या अदालत की निगरानी में कराने की मांग की गई।
याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि फर्जी संस्थानों का फैलाव समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुका है और संबंधित प्राधिकरण जानकारी होने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं कर रहे हैं।
अदालत ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे बेहद गंभीर हैं, क्योंकि ये कानूनों का उल्लंघन कर चलाए जा रहे फर्जी उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े हैं।
दिल्ली सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि राष्ट्रीय राजधानी में फर्जी विश्वविद्यालयों की जांच के लिए एक समिति गठित की गई।
इस पर हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को निर्देश दिया कि वह शपथपत्र दाखिल कर बताए कि समिति बनने के बाद क्या कदम उठाए गए और अब तक कितनी जानकारी जुटाई गई।
अदालत ने केंद्र सरकार, यूजीसी और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद को भी इस मुद्दे पर उठाए गए कदमों की जानकारी शपथपत्र के जरिए देने का निर्देश दिया।
मामले की अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।
याचिका में यह भी मांग की गई कि किसी रिटायर हाईकोर्ट जज की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय समिति गठित कर यह जांच की जाए कि आखिर किन खामियों के कारण ऐसे फर्जी संस्थान लगातार संचालित हो रहे हैं।
याचिका के अनुसार फर्जी विश्वविद्यालय खुद को वैध संस्थान बताकर स्टूडेंट्स को गुमराह करते हैं और उनके शैक्षणिक भविष्य, आर्थिक स्थिति तथा रोजगार के अवसरों को अपूरणीय नुकसान पहुंचाते हैं।
साथ ही यह भी कहा गया कि UGC द्वारा बार-बार चेतावनी और सार्वजनिक सूचनाएं जारी किए जाने के बावजूद इन संस्थानों के खिलाफ कोई ठोस या डर पैदा करने वाली कार्रवाई नहीं हुई।
याचिका में आरोप लगाया गया कि UGC Act, 1956 के मौजूदा ढांचे में कानूनी कमी है, क्योंकि नियामक संस्था के पास ऐसे फर्जी संस्थानों को बंद कराने या उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के पर्याप्त अधिकार नहीं हैं।

