विदेश में नौकरी का हवाला देकर विशेष विवाह अधिनियम की 30 दिन की अवधि में छूट नहीं मिल सकती: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
18 Jun 2026 12:29 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह करने की इच्छुक एक जोड़ी को 30 दिन की अनिवार्य नोटिस अवधि में छूट देने से इनकार किया। अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत कठिनाई या वास्तविक असुविधा भी कानून द्वारा निर्धारित अनिवार्य प्रक्रिया को कमजोर करने या उससे बचने का आधार नहीं बन सकती।
जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया, जिसमें याचिकाकर्ताओं ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत निर्धारित 30 दिन की प्रतीक्षा अवधि को कम करने और निर्धारित समय से पहले विवाह पंजीकरण की अनुमति देने की मांग की थी।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उन्होंने 11 मई 2026 को विवाह अधिकारी, कालकाजी के समक्ष विवाह का नोटिस प्रस्तुत किया था। कानून के अनुसार नोटिस के प्रकाशन के बाद 30 दिन की अवधि पूरी होने पर ही विवाह संपन्न कराया जा सकता है, जिसके चलते उनके विवाह की तिथि 19 जून 2026 निर्धारित की गई।
याचिका में कहा गया कि पुरुष पक्ष को विदेश में नौकरी मिल गई और उसे 10 जून 2026 से पहले कार्यभार ग्रहण करना है। ऐसे में यदि उन्हें 30 दिन की अवधि पूरी होने तक इंतजार करना पड़ा तो उन्हें गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि विशेष विवाह अधिनियम की वर्तमान व्यवस्था के तहत विवाह का संपादन नोटिस के प्रकाशन के 30 दिन बाद ही किया जा सकता है। यह केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि संसद द्वारा जानबूझकर बनाई गई वैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है।
अदालत ने कहा,
“व्यक्तिगत कठिनाई या असुविधा, चाहे वह कितनी भी वास्तविक क्यों न हो, अनिवार्य कानूनी प्रावधानों को कमजोर करने या उनसे बचने का आधार नहीं बन सकती। कानून कठोर हो सकता है लेकिन वह कानून है और उसका पालन करना आवश्यक है।”
पीठ ने कहा कि जब कानून स्वयं 30 दिन की अवधि पूरी होने के बाद ही विवाह संपन्न करने की अनुमति देता है, तब हाईकोर्ट अपने रिट अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए अधिकारियों को कानून के विपरीत कार्य करने का निर्देश नहीं दे सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि विधायिका जब कोई कानूनी ढांचा तैयार करती है तो वह संभावित व्यावहारिक कठिनाइयों और व्यक्तिगत परिस्थितियों से अवगत होती है। इसलिए अदालतों को व्यक्तिगत मामलों के आधार पर कानून की भाषा में बदलाव या उसके प्रभाव को कम करने से बचना चाहिए।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि न्यायालय किसी कानून की व्याख्या करते समय उसमें नए शब्द नहीं जोड़ सकता और न ही मौजूदा शब्दों को हटाकर उसकी मूल संरचना बदल सकता है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं को राहत दी जाती है तो इसका अर्थ होगा कि वैधानिक प्राधिकारियों को कानून के स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत कार्य करने का निर्देश दिया जाए, जो न्यायिक रूप से संभव नहीं है।
इन टिप्पणियों के साथ दिल्ली हाईकोर्ट ने 30 दिन की नोटिस अवधि में छूट देने और 10 जून से पहले विवाह संपन्न कराने की मांग वाली याचिका खारिज की।

