मालवीय नगर चुनाव विवाद: सतीश उपाध्याय की जीत बरकरार, हाइकोर्ट ने खारिज की सोमनाथ भारती की याचिका

Amir Ahmad

19 Jan 2026 3:10 PM IST

  • मालवीय नगर चुनाव विवाद: सतीश उपाध्याय की जीत बरकरार, हाइकोर्ट ने खारिज की सोमनाथ भारती की याचिका

    दिल्ली हाइकोर्ट ने आम आदमी पार्टी (AAP) के सीनियर नेता और पूर्व कानून मंत्री सोमनाथ भारती को बड़ा कानूनी झटका दिया। अदालत ने मालवीय नगर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक सतीश उपाध्याय के निर्वाचन को चुनौती देने वाली भारती की चुनाव याचिका खारिज की।

    जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने शुक्रवार को यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि याचिका में एक ऐसी गंभीर कानूनी खामी है, जिसे बाद में सुधारा नहीं जा सकता। गौरतलब है कि वर्ष 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में सतीश उपाध्याय ने सोमनाथ भारती को मात्र 2,131 मतों के अंतर से शिकस्त दी थी।

    सोमनाथ भारती ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार ने भ्रष्ट आचरण का सहारा लिया। भारती का मुख्य दावा था कि सतीश उपाध्याय ने कांग्रेस उम्मीदवार जितेंद्र कुमार कोचर को वित्तीय सहायता प्रदान की ताकि उनके वोट काटे जा सकें और चुनावी परिणाम को प्रभावित किया जा सके। हालांकि कानूनी पेच तब फंस गया, जब अदालत ने पाया कि सोमनाथ भारती ने अपनी याचिका में कांग्रेस उम्मीदवार कोचर को प्रतिवादी के रूप में शामिल ही नहीं किया।

    अदालत ने याचिका खारिज करने का मुख्य आधार जरूरी पक्षकार को शामिल न करने को बनाया।

    जस्टिस जसमीत सिंह ने अपने फैसले में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (ROPA), 1951 की धाराओं का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी चुनाव याचिका में किसी अन्य उम्मीदवार पर भ्रष्ट आचरण में शामिल होने का आरोप लगाया जाता है तो उस उम्मीदवार को पक्षकार बनाना अनिवार्य है। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि यह कोई मामूली तकनीकी चूक नहीं है, बल्कि एक ऐसा 'लाइलाज दोष' है जो पूरी याचिका की वैधता को ही खत्म कर देता है।

    सुनवाई के दौरान भारती के वकीलों ने तर्क दिया था कि केवल पैसे लेना भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए कांग्रेस उम्मीदवार को पक्षकार बनाना जरूरी नहीं था। लेकिन हाइकोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने 1958 के संशोधन का जिक्र करते हुए साफ किया कि किसी भी प्रकार का प्रलोभन या लाभ स्वीकार करना भ्रष्टाचार है।

    जस्टिस सिंह ने टिप्पणी की कि जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संबंध में कानूनी स्थिति पहले ही स्पष्ट की जा चुकी है तो ट्रायल कोर्ट या हाइकोर्ट सहानुभूति या न्याय की अपनी धारणा के आधार पर उन नियमों को शिथिल नहीं कर सकते।

    हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनाव कानून एक स्वयं-निहित संहिता है। इसका अर्थ है कि एक बार चुनाव याचिका दायर करने की निर्धारित 45 दिनों की अवधि बीत जाने के बाद इसमें किसी भी बड़े बदलाव या संशोधन की अनुमति नहीं दी जा सकती।

    अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जैसे ही याचिका में किसी उम्मीदवार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, उसे पक्षकार न बनाना पूरी याचिका के लिए घातक साबित होता है, चाहे वे आरोप अंततः साबित हों या न हों। इस फैसले के बाद सतीश उपाध्याय की विधायकी पर मंडरा रहा कानूनी खतरा फिलहाल टल गया।

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