प्राइवेट ऑफिस में बिना 'सार्वजनिक दृष्टि' के जातिसूचक टिप्पणी SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

23 July 2026 3:05 PM IST

  • प्राइवेट ऑफिस में बिना सार्वजनिक दृष्टि के जातिसूचक टिप्पणी SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी प्राइवेट ऑफिस रूम में आम लोगों या किसी स्वतंत्र गवाह की मौजूदगी के बिना कथित जातिसूचक टिप्पणी की जाती है तो वह अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act ) के तहत अपराध नहीं मानी जाएगी।

    जस्टिस मधु जैन ने कहा कि अधिनियम की धारा 3(1)(x) के तहत अपराध बनने के लिए यह आवश्यक है कि कथित अपमान या धमकी सार्वजनिक दृष्टि में आने वाले स्थान पर हुई हो। यह इस अपराध का अनिवार्य तत्व है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने ट्रांस वर्ल्ड रेडियो इंडिया के चार पदाधिकारियों के खिलाफ SC/ST की धारा 3(1)(x) के तहत आरोप तय करने का ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया। हालांकि, भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत आरोप बनते हैं या नहीं इस पर नए सिरे से विचार करने के लिए मामला वापस विचारण अदालत को भेज दिया।

    याचिका ट्रांस वर्ल्ड रेडियो इंडिया के प्रशासन एवं मानव संसाधन निदेशक, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, पर्यवेक्षक और तकनीकी निदेशक की ओर से दायर की गई।

    मामले में संगठन के सफाई कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि उनके साथ जातिसूचक टिप्पणियां की गईं, ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया गया और नौकरी से निकालने की धमकी दी गई। शिकायत में यह भी आरोप था कि उन्हें शौचालय के पास बैठकर भोजन करने के लिए मजबूर किया गया।

    साल 2012 में विचारण अदालत ने प्रथम दृष्टया मामला मानते हुए SC/ST Act के तहत आरोप तय करने का आदेश दिया था।

    हाईकोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट रेबेका जॉन ने तर्क दिया कि शिकायत में लगाए गए आरोपों को सही मान भी लिया जाए तब भी अधिनियम की वह शर्त पूरी नहीं होती, जिसके अनुसार कथित अपमान सार्वजनिक दृष्टि में होना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरोपों के अनुसार कथित टिप्पणियां कार्यालय के निजी कक्षों में हुई थीं और वहां कोई स्वतंत्र व्यक्ति मौजूद नहीं था।

    याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि जातिसूचक टिप्पणी के आरोप पहली बार मजिस्ट्रेट के समक्ष दायर शिकायत में लगाए गए, जबकि पुलिस को पहले दी गई शिकायतों में मुख्य रूप से धर्म परिवर्तन के दबाव और भेदभाव का ही उल्लेख था।

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सार्वजनिक दृष्टि में घटना होना एससी/एसटी अधिनियम के इस अपराध का अनिवार्य तत्व है।

    अदालत ने कहा,

    "29 फरवरी 2008 की शिकायत से स्पष्ट है कि कथित जातिसूचक टिप्पणियां याचिकाकर्ताओं के ऑफिस रूम के भीतर किए जाने का आरोप है। शिकायत में कहीं भी यह उल्लेख नहीं है कि उस समय कोई आम व्यक्ति या स्वतंत्र गवाह मौजूद था।"

    इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया SC/ST Act के तहत आरोप कायम नहीं रह सकते। इसलिए इस अधिनियम के तहत आरोप तय करने का आदेश रद्द किया गया। हालांकि, IPC के तहत आरोप तय किए जाने के प्रश्न पर विचारण अदालत नए सिरे से फैसला करेगी।

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