सिर्फ दुर्व्यवहार से नहीं बनता SC-ST Act का मामला: दिल्ली हाईकोर्ट ने DU प्रोफेसर के खिलाफ FIR रद्द की
Amir Ahmad
10 April 2026 4:19 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया कि केवल किसी अनुसूचित जाति के व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार करना अपने आप में SC-ST अत्याचार निवारण कानून के तहत अपराध नहीं बनता। इसके लिए यह साबित होना आवश्यक है कि आरोपी ने जाति के आधार पर अपमान करने की मंशा से कार्य किया हो।
जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने कहा,
“SC-ST कानून की धारा 3 के तहत अपराध तभी बनता है जब यह स्पष्ट हो कि कथित कृत्य पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा से किया गया हो। केवल यह पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से है और उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ है।”
मामला दिल्ली यूनिवर्सिटी के लक्ष्मीबाई कॉलेज की दो एसोसिएट प्रोफेसरों के बीच अगस्त 2021 में हुई बहस से जुड़ा था। विभागीय बैठक के दौरान कार्यवाही पर हस्ताक्षर को लेकर विवाद शुरू हुआ, जिसमें शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट की गई और सहकर्मियों के सामने अपमानित किया गया।
अदालत ने पाया कि घटना के तुरंत बाद दी गई शिकायतों में केवल शारीरिक विवाद का जिक्र था जबकि बाद में जातिगत टिप्पणी के आरोप जोड़े गए। रिकॉर्ड की जांच में यह भी सामने आया कि कथित जातिसूचक टिप्पणी के संबंध में स्पष्ट और ठोस विवरण नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में यह जरूरी है कि शिकायत में ही स्पष्ट रूप से यह दिखे कि कृत्य और पीड़ित की जाति के बीच सीधा संबंध है। अदालत ने यह भी नोट किया कि केवल एक गवाह ने जातिसूचक टिप्पणी का आरोप लगाया जिसे अन्य गवाहों ने समर्थन नहीं दिया।
इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि SC-ST कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते हैं, इसलिए संबंधित धाराओं को निरस्त किया जाता है।
साथ ही, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 323 और 504 के तहत दर्ज आरोपों को भी खारिज कर दिया गया। अदालत ने कहा कि ये गैर-संज्ञेय अपराध हैं और इनके लिए मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति आवश्यक थी, जो नहीं ली गई थी।
इसी के साथ हाईकोर्ट ने FIR रद्द की।

