सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट: कदीमी मस्जिद को बनाए रखने की याचिका पर हाईकोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

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    सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास प्रोजेक्ट के तहत कृषि भवन परिसर में स्थित कदीमी मस्जिद को बनाए रखने की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार NDMC और दिल्ली वक्फ बोर्ड से जवाब मांगा।

    जस्टिस अनिश दयाल ने कदीमी मस्जिद की देखरेख करने वाली समिति की याचिका पर नोटिस जारी किया।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद ने अदालत में स्पष्ट किया कि उनकी याचिका का उद्देश्य सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना को रोकना या उसमें देरी करना नहीं है। उन्होंने कहा कि याचिका केवल कदीमी मस्जिद के संबंध में उठाए जा रहे कदमों और उसके लंबे समय से इस्तेमाल कर रहे लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव तक सीमित है।

    सुनवाई के दौरान खुर्शीद ने कहा कि मस्जिद कई दशकों से सरकारी कर्मचारियों और आसपास के सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले अन्य लोगों के लिए नमाज अदा करने का स्थान रही है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, यह ढांचा काफी पुराना है और वर्तमान सरकारी परिसर के निर्माण से पहले से वहां मौजूद था।

    अदालत के आदेश में दर्ज है कि याचिकाकर्ताओं के अनुसार दिल्ली वक्फ बोर्ड ने 1970 में इस संपत्ति को वक्फ संपत्ति के रूप में अधिसूचित किया और उसकी प्राचीनता का भी उल्लेख किया। याचिका में कहा गया कि 1950 और 1960 के दशक में कृषि भवन, शास्त्री भवन और आसपास के सरकारी कार्यालयों के निर्माण के बावजूद कदीमी मस्जिद अपने स्थान पर बनी रही और वहां मुस्लिम कर्मचारी नमाज अदा करते रहे।

    याचिका में अधिकारियों को मस्जिद को गिराने, तोड़ने, हटाने या किसी अन्य तरीके से प्रभावित करने से पहले उसके मौजूदा स्थान पर बने रहने की संभावना पर निष्पक्ष, पारदर्शी और तर्कसंगत तरीके से विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई। इसके साथ ही सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत मस्जिद को मौजूदा स्थान पर बनाए रखने की व्यवहारिकता पर भी विचार करने का अनुरोध किया गया।

    याचिकाकर्ताओं ने वैकल्पिक तौर पर कहा कि यदि अधिकारी यह स्थापित करते हैं कि मौजूदा स्थान पर मस्जिद को बनाए रखना वास्तव में संभव नहीं है या स्वीकृत पुनर्विकास योजना के अनुरूप नहीं है तो नमाज के लिए उचित, पर्याप्त और नजदीकी वैकल्पिक स्थान उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

    याचिकाकर्ताओं ने यह भी स्वीकार किया कि मस्जिद के नीचे की जमीन सरकार की है। हालांकि, उनका कहना है कि मौजूदा पुनर्विकास योजना के कारण मस्जिद को हटाए जाने की आशंका पैदा हुई है। इसी संदर्भ में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए नमाज की सुविधा की निरंतरता सुनिश्चित करने की मांग की।

    17 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान खुर्शीद ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ताओं को केंद्र सरकार की सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कॉमन सेक्रेटेरिएट भवनों के निर्माण पर रोक लगाने या उसमें देरी की मांग नहीं कर रहे हैं।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा,

    “याचिका केवल कदीमी मस्जिद के साथ किए जाने वाले व्यवहार और उसके स्थापित उपयोगकर्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव तक सीमित है।”

    केंद्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि वह इस मामले में सरकार से निर्देश लेकर अपना जवाब दाखिल करेंगे।

    इसके बाद जस्टिस अनिश दयाल ने केंद्र सरकार, NDMC और दिल्ली वक्फ बोर्ड को नोटिस जारी किया। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

    मामले की अगली सुनवाई 2 नवंबर को होगी।

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