प्राइवेट स्कूल अतिरिक्त धनराशि रख सकते हैं, केवल सरप्लस होना मुनाफाखोरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
26 May 2026 6:16 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्राइवेट गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों को अतिरिक्त धनराशि रखने की कानूनी अनुमति है और केवल किसी स्कूल के पास अधिशेष राशि होने भर से उसे मुनाफाखोरी या शिक्षा के व्यावसायीकरण का दोषी नहीं माना जा सकता।
जस्टिस अनुप जयराम भंभानी ने कहा,
“किसी निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूल के पास अतिरिक्त धनराशि उपलब्ध होना, चाहे वह कितनी भी अधिक क्यों न हो, केवल इसी आधार पर शिक्षा निदेशालय यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि स्कूल व्यावसायीकरण या मुनाफाखोरी कर रहा है। इसलिए फीस बढ़ोतरी का विरोध किया जाए।”
120 पृष्ठों के अपने फैसले में अदालत ने कहा कि दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम के तहत शिक्षा निदेशालय के पास मुनाफाखोरी रोकने की नियामक शक्तियां जरूर हैं, लेकिन उसे यह भी ध्यान रखना होगा कि स्कूलों को विकास, विस्तार और भविष्य की जरूरतों के लिए उचित अधिशेष राशि बनाने और रखने का अधिकार है।
अदालत निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूलों द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं में शिक्षा निदेशालय द्वारा फीस वृद्धि प्रस्ताव खारिज किए जाने और फीस निर्धारण से जुड़े नियामक ढांचे को चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि शिक्षा निदेशालय की भूमिका केवल शिक्षा के व्यावसायीकरण और मुनाफाखोरी को रोकने तक सीमित है।
अदालत ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ग) के तहत स्कूलों को वित्तीय और प्रशासनिक मामलों में पर्याप्त स्वायत्तता प्राप्त है।
अदालत ने कहा कि शिक्षा निदेशालय का काम केवल यह सुनिश्चित करना है कि स्कूल अनुचित फीस संरचना के जरिए छात्रों का शोषण न करें।
फैसले में कहा गया,
“कोई स्कूल अतिरिक्त धनराशि रख सकता है और उसका उपयोग स्कूल के सुधार, विकास और बेहतर सुविधाओं के लिए कर सकता है। दिल्ली स्कूल शिक्षा नियमों के नियम 177(2)(ई) में भी उचित अधिशेष राशि की अवधारणा को मान्यता दी गई। किसी स्कूल से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह बिना किसी अतिरिक्त धनराशि के केवल दैनिक जरूरतों के आधार पर काम करे।”
अदालत ने शिक्षा निदेशालय को चेताया कि हर अधिशेष राशि को मुनाफाखोरी का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी स्कूल द्वारा व्यावसायीकरण या मुनाफाखोरी किए जाने का निष्कर्ष तभी निकाला जा सकता है, जब शिक्षा निदेशालय दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम की धारा 18(5) के तहत निर्धारित प्राधिकारी से स्कूल का विस्तृत वित्तीय ऑडिट कराए। यह जांच स्कूलों द्वारा जमा किए गए विधिवत ऑडिटेड वित्तीय दस्तावेजों और अन्य अभिलेखों के आधार पर होनी चाहिए।
अदालत ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षा निदेशालय किसी स्कूल को अलग या समानांतर लेखा प्रणाली रखने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। स्कूलों को केवल आयकर अधिनियम और भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेंट संस्थान के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही खातों का रखरखाव करना होगा।

