22 साल जेल काटने के बाद उम्रकैदी की रिहाई का आदेश, अपराध की गंभीरता के आधार पर बार-बार इनकार पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त

Amir Ahmad

7 April 2026 5:07 PM IST

  • 22 साल जेल काटने के बाद उम्रकैदी की रिहाई का आदेश, अपराध की गंभीरता के आधार पर बार-बार इनकार पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त

    दिल्ली हाईकोर्ट ने 22 साल से अधिक सजा काट चुके एक उम्रकैदी की समयपूर्व रिहाई का आदेश देते हुए सेंटेंस रिव्यू बोर्ड (एसआरबी) के फैसलों पर कड़ी टिप्पणी की।

    अदालत ने कहा कि केवल अपराध की गंभीरता के आधार पर बार-बार रिहाई से इनकार करना यांत्रिक और मनमाना है।

    जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने राजब अली की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। अली को वर्ष 2005 में दुष्कर्म के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई।

    अदालत ने पाया कि एसआरबी ने 2016 से लेकर 2024 तक कई बार उसकी रिहाई की अर्जी खारिज की और हर बार लगभग एक ही कारण दिया गया अपराध की गंभीरता। यहां तक कि 2024 में दसवीं बार भी इसी आधार पर उसकी अर्जी ठुकरा दी गई।

    कोर्ट ने कहा,

    “केवल अपराध की गंभीरता या जघन्यता के आधार पर बार-बार इनकार करना रिमिशन नीति के सिद्धांतों के खिलाफ है।”

    अदालत ने यह भी नोट किया कि अली का जेल में आचरण संतोषजनक रहा है। उसे कई बार पैरोल और फर्लो मिली, और वह तिहाड़ जेल के सेमी-ओपन जेल में रहकर काम कर रहा था। उसके अच्छे व्यवहार के लिए उसे कई प्रशंसा भी मिलीं।

    कोर्ट ने कहा कि सुधारात्मक न्याय के सिद्धांत के अनुसार यह देखना जरूरी है कि कैदी समाज में वापस जाने के लिए कितना तैयार है। इस मामले में रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि अली पूरी तरह सुधर चुका है।

    अदालत ने कहा,

    “लगातार 22 साल की सजा और कुल 28 साल (रिमिशन सहित) जेल में बिताने, अच्छे आचरण और किसी भी नकारात्मक टिप्पणी के अभाव से यह साबित होता है कि उसमें अपराध करने की कोई प्रवृत्ति नहीं बची है।”

    कोर्ट ने यह भी माना कि रिहाई से इनकार करना उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है।

    हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल अपराध की गंभीरता को आधार बनाकर रिहाई से इनकार नहीं किया जा सकता, बल्कि कैदी के सुधार और उसके व्यवहार को भी समान रूप से महत्व देना जरूरी है।

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