सीवर मौत मामले में जूनियर इंजीनियर को बड़ी राहत, विभागीय जांच में दोषमुक्ति के बाद FIR रद्द: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
9 July 2026 6:54 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने वर्ष 2017 के लाजपत नगर सीवर मौत मामले में दिल्ली जल बोर्ड के एक जूनियर इंजीनियर के खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। अदालत ने कहा कि जब किसी कर्मचारी को समान आरोपों पर विभागीय जांच में गुण-दोष के आधार पर दोषमुक्त कर दिया गया हो, तब उन्हीं आरोपों पर आपराधिक मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
जस्टिस विकास महाजन ने दिल्ली जल बोर्ड में जूनियर इंजीनियर रहे सतेंद्र कुमार श्रीवास्तव की याचिका स्वीकार करते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304, 177, 218, 467, 468, 471 और 120-बी के तहत दर्ज FIR के साथ-साथ हाथ से मैला उठाने वालों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत की गई कार्यवाही भी निरस्त की।
यह मामला 6 अगस्त 2017 का है, जब लाजपत नगर में सीवर की हाथ से सफाई के दौरान दम घुटने से तीन मजदूरों की मौत हो गई थी।
अभियोजन का आरोप था कि जूनियर इंजीनियर ने बिना मौके पर निगरानी सुनिश्चित किए और अनिवार्य सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराए बिना सीवर सफाई का काम कराया। साथ ही जांच को गुमराह करने के लिए जेटिंग मशीन के अभिलेख में भी हेरफेर किया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि इन्हीं आरोपों पर विभागीय जांच पहले ही हो चुकी है और उसमें उन्हें पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया गया। जांच अधिकारी ने पाया कि लापरवाही और अभिलेख में हेरफेर के आरोप साबित नहीं हुए। इसके बाद सक्षम प्राधिकारी ने सितंबर 2020 में जांच रिपोर्ट स्वीकार करते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया था।
याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि इसी मामले में सह-आरोपी असिस्टेंट इंजीनिय और कार्यकारी इंजीनियर के खिलाफ दर्ज कार्यवाही को भी दिल्ली हाईकोर्ट पहले ही रद्द कर चुका है, क्योंकि उन्हें भी विभागीय जांच में दोषमुक्त किया गया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच और आपराधिक मामले में लगाए गए आरोप पूरी तरह समान थे। जांच अधिकारी को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता ने सीवर सफाई का आदेश दिया था, यह कार्य उनके अधिकार क्षेत्र में कराया गया था या उन्होंने जेटिंग मशीन के अभिलेख में कोई हेरफेर की थी।
सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि यदि समान आरोपों पर विभागीय जांच में कर्मचारी को गुण-दोष के आधार पर दोषमुक्त कर दिया गया हो, तो उसी आधार पर आपराधिक मुकदमा चलाना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि जब विभागीय जांच, जिसमें साक्ष्य का मानक अपेक्षाकृत कम होता है, उसमें भी आरोप सिद्ध नहीं हुए, तो अधिक कठोर साक्ष्य मानक वाले आपराधिक मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
हाथ से मैला उठाने वालों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम तथा SC/ST Act के तहत लगाए गए आरोपों पर भी अदालत ने कहा कि ये मुख्य आपराधिक आरोपों पर आधारित सहायक अपराध हैं। जब IPC के तहत मूल आरोप ही टिक नहीं पाए, तो इन अधिनियमों के तहत दर्ज अपराध भी स्वतः नहीं रह सकते।
इन्हीं आधारों पर दिल्ली हाईकोर्ट ने जूनियर इंजीनियर के खिलाफ दर्ज FIR और उससे संबंधित सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द किया।


