BCI चेयरमैन का सत्तारूढ़ दल का सांसद होने से दिल्ली पुलिस पर संदेह नहीं कर सकते: हाईकोर्ट ने वकीलों से कथित मारपीट की CBI जांच की मांग खारिज की
Amir Ahmad
21 Sept 2026 3:07 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) परिसर के भीतर और बाहर वकीलों के साथ कथित मारपीट के मामले में CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग वाली याचिका खारिज की।
जस्टिस गिरिश कथपालिया ने कहा कि केवल इस आधार पर दिल्ली पुलिस की निष्पक्षता पर संदेह नहीं किया जा सकता कि BCI के चेयरमैन सत्तारूढ़ दल से जुड़े सांसद हैं।
जस्टिस ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी इस आशंका के समर्थन में कोई ठोस आधार पेश नहीं किया। ऐसे में पूरी दिल्ली पुलिस पर इस तरह का आरोप लगाना उचित नहीं है, खासकर तब जब याचिकाकर्ताओं की अपनी शिकायत से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता हुआ दिखाई नहीं देता।
अदालत ने कहा कि किसी सरकारी संस्था को सामान्य और व्यापक आरोपों के आधार पर बदनाम करने से बचना चाहिए। कोर्ट के मुताबिक, इस तरह के आरोप आम लोगों के मन में पूरे तंत्र के प्रति अविश्वास और निराशा पैदा कर सकते हैं।
मामले में वकीलों की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि दिल्ली पुलिस सरकार के अधीन काम करती है और BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा सत्तारूढ़ दल के सांसद हैं। इसलिए मामले की जांच दिल्ली पुलिस से कराने पर निष्पक्षता को लेकर आशंका पैदा होती है। इसी आधार पर CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की गई।
याचिकाकर्ताओं ने यह भी मांग की थी कि CBI को संबंधित अवधि के अपने परिसर की CCTV रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने और जांच एजेंसी को सौंपने का निर्देश दिया जाए।
वकीलों की ओर से अदालत को बताया गया कि घटना के संबंध में शिकायत किए जाने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने कार्रवाई नहीं की। यह भी दलील दी गई कि संबंधित मजिस्ट्रेट CCTV फुटेज जब्त करने या जांच से जुड़े अन्य कदम उठाने का निर्देश नहीं दे सकता और न ही वह CBI जांच का आदेश देने के लिए सक्षम है।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत का प्रभावी वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है। याचिकाकर्ता यह भी नहीं बता सके कि जिस थाना प्रभारी के समक्ष घटना की शिकायत की गई थी, उसकी ओर से लापरवाही या निष्क्रियता किस आधार पर मानी जाए।
अदालत ने कहा,
“आज तक याचिकाकर्ताओं ने संबंधित पुलिस उपायुक्त के समक्ष कोई शिकायत नहीं की है और न ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 223 के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट से संपर्क किया।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका में यह तक नहीं बताया गया है कि ये वैकल्पिक उपाय प्रभावी क्यों नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की शिकायतों का भी अवलोकन किया और कहा कि उनमें प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध बनता हुआ नहीं दिखाई देता। अदालत ने BNSS की धारा 174 का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे मामले में संबंधित मजिस्ट्रेट ही कार्रवाई कर सकता है और इस धारा की उपधारा (2) के तहत पुलिस अधिकारी को ऐसे अपराध की जांच करने का अधिकार नहीं है।
CCTV फुटेज जब्त किए जाने के संबंध में अदालत ने याचिकाकर्ताओं की दलील को भी खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि BNSS के अध्याय 16 के प्रावधानों के दायरे को देखते हुए यह कहना गलत है कि मजिस्ट्रेट कोर्ट CCTV फुटेज जब्त करने का निर्देश नहीं दे सकता। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं अपनी याचिका में कहा है कि संबंधित वीडियो सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी इस घटना की CBI जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को संबंधित हाईकोर्ट का रुख करने की स्वतंत्रता दी थी। इसके बाद यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष आया।

