PoSH कमेटी में पक्षपात की आशंका मात्र से उसका पुनर्गठन नहीं हो सकता, 90 दिन में जांच पूरी करने का निर्देश: दिल्ली हाईकोर्ट
Amir Ahmad
29 Oct 2026 4:05 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की शिकायतों की जांच के लिए गठित इंटरनल कमेटी के गठन को केवल पक्षपात की आशंका के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके लिए रिकॉर्ड पर ठोस साक्ष्य होना जरूरी है, जिससे पक्षपात की वास्तविक संभावना दिखाई दे।
जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने कहा कि पहले लिए गए प्रशासनिक फैसलों से असंतुष्टि मात्र यह साबित नहीं करती कि कमेटी गठित करने वाले प्राधिकारी का जांच के परिणाम में कोई व्यक्तिगत या आर्थिक हित है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले एबीपी (पी) लिमिटेड बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए कहा कि पक्षपात की केवल आशंका पर्याप्त नहीं है और इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए रिकॉर्ड पर ठोस साक्ष्य उपलब्ध होने चाहिए।
हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के कालिंदी कॉलेज की दो एसोसिएट प्रोफेसरों की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। दोनों ने अपनी यौन उत्पीड़न शिकायत की जांच के लिए गठित इंटरनल कमेटी का पुनर्गठन करने की मांग की थी।
प्रोफेसरों ने वाइस चांसलर के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें पहले की जांच रद्द कर नए सिरे से जांच करने का निर्देश दिया गया। उन्होंने कॉलेज की प्रिंसिपल द्वारा बाद में गठित नई इंटरनल कमेटी पर भी आपत्ति जताई।
दोनों प्रोफेसरों ने जुलाई 2025 में शिकायत दर्ज कराई थी। इसमें कुछ फैकल्टी सदस्यों पर उत्पीड़न, धमकाने और अपमानजनक तथा यौन संकेतों वाली टिप्पणियां करने का आरोप लगाया गया। शिकायत के अनुसार, ऐसी टिप्पणियां स्टाफ एसोसिएशन के व्हाट्सऐप ग्रुप में और 3 जुलाई 2025 को हुई एक बैठक के दौरान की गईं।
पहले गठित इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी ने निष्कर्ष निकाला था कि लगाए गए आरोप यौन प्रकृति के नहीं थे। कॉलेज की गवर्निंग बॉडी ने इस साल जनवरी में उस रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया था।
इसके बाद वाइस चांसलर ने पिछली जांच रद्द की। उन्होंने पाया कि शिकायत में वर्णित घटनाओं से संबंधित एक सदस्य ने जांच की कार्यवाही में हिस्सा लिया था, जिससे पक्षपात की उचित आशंका पैदा हुई। वाइस चांसलर ने यह भी पाया कि लागू यूजीसी नियमों के तहत कमेटी में बाहरी सदस्य शामिल करने की अनिवार्य शर्त का उचित पालन नहीं हुआ।
हालांकि, दोनों प्रोफेसरों ने नई कमेटी के गठन को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि प्रिंसिपल स्वयं उन प्रशासनिक फैसलों में शामिल रही थीं, जिनके खिलाफ उन्होंने शिकायतें की थीं। उन्होंने उस फैकल्टी सदस्य को भी कमेटी में शामिल किए जाने पर आपत्ति जताई, जो विवादित स्टाफ एसोसिएशन बैठक में मौजूद थी। इसके अलावा, प्रिंसिपल के अधीन काम करने वाले एक गैर-शिक्षण कर्मचारी की नियुक्ति पर भी सवाल उठाया गया।
हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि यूजीसी नियमों के तहत प्रिंसिपल वैधानिक कार्यकारी प्राधिकारी हैं और उन्हें इंटरनल कमेटी के सदस्यों को नामित करने का अधिकार है। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रिंसिपल स्वयं शिकायत में प्रतिवादी नहीं थीं और पहले की कमेटी के किसी भी सदस्य को नई कमेटी में शामिल नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा कि प्रिंसिपल द्वारा पहले लिए गए प्रशासनिक फैसले यह साबित नहीं करते कि जांच के नतीजे में उनका कोई व्यक्तिगत या आर्थिक हित है। जांच करने का अधिकार इंटरनल कमेटी के पास है, जिसे स्वतंत्र रूप से अपना काम करना होगा।
स्टाफ एसोसिएशन की बैठक में मौजूद रही फैकल्टी सदस्य की नियुक्ति पर कोर्ट ने कहा कि केवल बैठक में उपस्थित होने से यह साबित नहीं होता कि वह शिकायत के विषय से जुड़ी हुई थीं या उसमें उनका कोई हित था। यदि इस आधार पर उन्हें अयोग्य माना जाए, तो बैठक में शामिल प्रत्येक फैकल्टी सदस्य को कमेटी से बाहर करना पड़ेगा।
प्रिंसिपल के सीनियर पर्सनल असिस्टेंट को कमेटी में शामिल करने पर भी कोर्ट ने आपत्ति स्वीकार नहीं की। कोर्ट ने कहा कि यूजीसी नियमों के तहत कमेटी में दो गैर-शिक्षण कर्मचारियों को शामिल करना अनिवार्य है। केवल प्रशासनिक रूप से प्रिंसिपल के अधीन काम करने के कारण किसी कर्मचारी को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वाइस चांसलर ने शिकायत के गुण-दोष पर स्वयं फैसला सुनाने के बजाय नए सिरे से जांच का निर्देश देकर सही किया, क्योंकि पिछली कमेटी के गठन में खामियों के कारण उसकी जांच टिकाऊ नहीं रह गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैधानिक व्यवस्था में किसी कॉलेज के भीतर उठी शिकायत की जांच के लिए वाइस चांसलर द्वारा अलग विश्वविद्यालय-स्तरीय कमेटी गठित करने की परिकल्पना नहीं की गई।
नई कमेटी के गठन या वाइस चांसलर के आदेश में कोई कानूनी खामी नहीं पाते हुए हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। हालांकि, शिकायत 15 महीने से अधिक समय से लंबित होने पर कोर्ट ने नई इंटरनल कमेटी को निर्देश दिया कि वह फैसले की प्रति प्राप्त होने के 90 दिनों के भीतर जांच पूरी करने का प्रयास करे। जांच PoSH Act, लागू नियमों, यूजीसी नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप की जानी चाहिए।

