सरकारी वकीलों की कमी से जमानत मामलों और ट्रायल पर असर: दिल्ली हाईकोर्ट, राज्य पर लगा ₹5,000 का जुर्माना रोकने से इनकार
Amir Ahmad
29 Oct 2026 3:40 PM IST

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकारी अभियोजकों की कमी को एक लगातार बनी रहने वाली समस्या बताया, जिससे आपराधिक मुकदमों और जमानत याचिकाओं के निपटारे पर गंभीर असर पड़ता है।
जस्टिस गिरिश कथपालिया ने राज्य सरकार पर लगाए गए 5,000 रुपये के जुर्माने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि कोर्ट ने अभियोजन निदेशक की सैलरी से इस राशि की वसूली पर अगली सुनवाई तक रोक लगाई।
कोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जिससे पता चले कि राज्य सरकार ने सरकारी अभियोजकों की कमी दूर करने के लिए कोई गंभीर कदम उठाए।
जस्टिस कथपालिया ने कहा,
“यह कोई नई समस्या नहीं है। मेरे सामने ऐसा कुछ नहीं है, जिससे पता चले कि राज्य ने इसे दूर करने के लिए कोई गंभीर कदम उठाए हैं। बल्कि राज्य ने उस आदेश को चुनौती तक नहीं दी है। इसलिए मैं राज्य पर लगाए गए जुर्माने पर रोक लगाने के पक्ष में नहीं हूं।”
हाईकोर्ट अभियोजन निदेशक मकसूद अहमद की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने 6 अक्टूबर को एडिशनल सेशंस जज द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने राज्य पर 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया और यह राशि मकसूद अहमद के वेतन से वसूलने का निर्देश दिया।
ट्रायल कोर्ट ने यह जुर्माना इसलिए लगाया, क्योंकि बार-बार मामले को कुछ देर के लिए स्थगित किए जाने के बावजूद सुबह 11:30 बजे तक कोई सरकारी अभियोजक पेश नहीं हुआ।
मकसूद अहमद के वकील ने हाईकोर्ट को बताया कि ट्रायल कोर्ट को सरकारी अभियोजकों और अतिरिक्त सरकारी अभियोजकों की गंभीर कमी के बारे में पहले ही सूचित किया गया। यह भी बताया गया कि यह मुद्दा हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष पहले से लंबित है।
जस्टिस कथपालिया ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का आदेश लंबित मामलों के बढ़ते बोझ और जमानत याचिकाओं तथा आपराधिक मुकदमों का जल्द निपटारा सुनिश्चित करने के दबाव को लेकर उसकी चिंता दर्शाता है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि किसी तरह की लापरवाही या कदाचार को लेकर कोई स्पष्ट टिप्पणी किए बिना मकसूद अहमद के वेतन से जुर्माने की वसूली का निर्देश प्रथम दृष्टया उचित नहीं लगता। इस आधार पर कोर्ट ने अगली सुनवाई तक उनके वेतन से जुर्माने की वसूली पर रोक लगाई।
हालांकि, राज्य सरकार पर लगाए गए जुर्माने पर रोक लगाने की मांग खारिज की गई, क्योंकि राज्य ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती नहीं दी थी।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को अगली सुनवाई से कम से कम एक सप्ताह पहले विस्तृत जवाब और स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय दिया।
मामले की अगली सुनवाई 3 फरवरी 2027 को होगी।

