परीक्षा की निष्पक्षता में मानसिक शांति भी शामिल: दिल्ली हाइकोर्ट ने बायोमेट्रिक गड़बड़ी से प्रभावित JEE अभ्यर्थी को दोबारा परीक्षा देने की अनुमति दी

Amir Ahmad

6 Feb 2026 1:40 PM IST

  • परीक्षा की निष्पक्षता में मानसिक शांति भी शामिल: दिल्ली हाइकोर्ट ने बायोमेट्रिक गड़बड़ी से प्रभावित JEE अभ्यर्थी को दोबारा परीक्षा देने की अनुमति दी

    दिल्ली हाइकोर्ट ने अहम फैसले में कहा कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की निष्पक्षता केवल परीक्षा कक्ष में प्रवेश देने तक सीमित नहीं होती बल्कि यह भी जरूरी है कि अभ्यर्थी को ऐसे प्रक्रियात्मक झटकों का सामना न करना पड़े जो उसकी मानसिक शांति और एकाग्रता को भंग कर दें।

    इसी आधार पर हाइकोर्ट ने JEE 2026 की मुख्य परीक्षा (सेशन-I) में बायोमेट्रिक गड़बड़ी से प्रभावित अभ्यर्थी को दोबारा परीक्षा देने की अनुमति दी।

    मामले की सुनवाई जस्टिस जस्मीत सिंह ने की।

    याचिकाकर्ता श्लोक भारद्वाज परीक्षा केंद्र पर समय से पहुंचे थे लेकिन आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन में बार-बार विफलता के कारण परीक्षा शुरू होने से पहले उनकी पहचान की पुष्टि नहीं हो सकी।

    इस प्रक्रिया में उनका आधार काफी देर तक ब्लॉक रहा जिससे उन्हें परीक्षा के दौरान गहरी बेचैनी और तनाव का सामना करना पड़ा।

    अभ्यर्थी का कहना था कि बायोमेट्रिक सत्यापन अंततः परीक्षा के बीच में पूरा हुआ लेकिन तब तक अयोग्य घोषित किए जाने या परीक्षा से बाहर कर दिए जाने का डर उनकी एकाग्रता और लय को पूरी तरह तोड़ चुका था।

    उन्होंने यह भी बताया कि उसी कक्ष में बैठे अन्य परीक्षार्थियों को भी इसी तरह की तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

    सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी ने अपनी शिकायत निवारण समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि परीक्षा के दौरान कोई बार-बार बाधा नहीं आई और अभ्यर्थी को बिना रुकावट कंप्यूटर सिस्टम तक पहुंच मिली।

    एजेंसी ने यह भी बताया कि उन्होंने 68 प्रश्न देखे और 28 प्रश्न हल किए, जिससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि उन्हें कोई वास्तविक नुकसान नहीं हुआ।

    हालांकि हाइकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। जस्टिस जस्मीत सिंह ने कहा कि परीक्षा देना कोई वैज्ञानिक फार्मूला नहीं है जहां केवल आंकड़ों से निष्कर्ष निकाला जा सके। किसी भी अभ्यर्थी को बेहतर प्रदर्शन के लिए मानसिक रूप से सहज और शांत होना जरूरी होता है। समयबद्ध परीक्षा में हर मिनट अहम होता है और ऐसे में अयोग्यता या निष्कासन का डर मामूली या काल्पनिक नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने कहा कि परीक्षा केवल ज्ञान की नहीं बल्कि दबाव में उस ज्ञान को सही तरीके से लागू करने की क्षमता की भी परीक्षा होती है। इसके लिए शांत मन और स्थिर वातावरण जरूरी है। बायोमेट्रिक सत्यापन जैसी तकनीकी गड़बड़ियां, जिनसे अयोग्यता का खतरा पैदा हो किसी भी सामान्य अभ्यर्थी की मानसिक स्थिति पर गंभीर असर डालती हैं और उसका सीधा प्रभाव गति निर्णय-क्षमता और उत्तरों की शुद्धता पर पड़ता है।

    हाइकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल यह तथ्य कि अभ्यर्थी ने तनाव के बावजूद कुछ प्रश्न हल किए, यह साबित नहीं करता कि उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ। तनाव में किया गया प्रदर्शन सामान्य और निष्पक्ष परिस्थितियों में किए गए प्रदर्शन के बराबर नहीं हो सकता।

    अदालत ने शिकायत निवारण समिति की रिपोर्ट पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि वह केवल तकनीकी और वैज्ञानिक पहलुओं पर आधारित थी, जबकि परीक्षा के दौरान अभ्यर्थी को होने वाली मानसिक कठिनाइयों का आकलन इस नजरिये से नहीं किया जा सकता।

    इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस सिंह ने आदेश दिया कि फिलहाल याचिकाकर्ता को अगली परीक्षा में बैठने की अनुमति दी जाए। हालांकि परिणाम आगे के आदेशों के अधीन रहेगा।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश मामले की विशेष परिस्थितियों में दिया जा रहा है और इसे मिसाल के रूप में नहीं माना जाएगा।

    यह फैसला उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए अहम संदेश देता है कि परीक्षा की निष्पक्षता में तकनीकी सुविधा के साथ-साथ मानसिक संतुलन और भरोसेमंद माहौल भी उतना ही जरूरी है।

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