मंत्रियों को रोज़ जनता से वीडियो के ज़रिए मिलने का आदेश नहीं दे सकता कोर्ट: दिल्ली हाईकोर्ट

Amir Ahmad

14 April 2026 3:32 PM IST

  • मंत्रियों को रोज़ जनता से वीडियो के ज़रिए मिलने का आदेश नहीं दे सकता कोर्ट: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को यह निर्देश देने से इनकार किया कि सभी केंद्रीय मंत्री रोज़ाना कम-से-कम दो घंटे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जनता की शिकायतें सुनें। अदालत ने कहा कि ऐसी नीति बनाना कार्यपालिका का अधिकार क्षेत्र है और इसे अदालत के आदेश से लागू नहीं कराया जा सकता।

    मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पुरुषेन्द्र कुमार कौरव ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता की मांग सीधे तौर पर नीति निर्माण से जुड़ी है जो पूरी तरह सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।

    अदालत ने कहा,

    “नीतियां बनाना, प्रशासनिक व्यवस्था तय करना और कार्यपालिका के कामकाज का तरीका निर्धारित करना सरकार का विशेष अधिकार है।”

    अदालत ने यह भी कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट आमतौर पर ऐसे नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप नहीं करता, जब तक कि किसी कानून, संवैधानिक प्रावधान या स्पष्ट मनमानी का उल्लंघन न हो।

    यह याचिका ओंकार शर्मा नामक सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी द्वारा दायर की गई। उन्होंने अदालत से मांग की थी कि केंद्र सरकार एक ऐसी योजना बनाए, जिससे सभी केंद्रीय मंत्री रोज़ाना निश्चित समय तक जनता से सीधे जुड़कर उनकी शिकायतें सुनें। उन्होंने अपनी याचिका को जनहित याचिका में बदलने की भी मांग की थी।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि सरकारी विभागों में उन्हें कई बार दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा और मंत्रियों तक सीधी पहुंच न होने के कारण उनकी शिकायतों का समाधान प्रभावी ढंग से नहीं हो पाया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि ऐसा आदेश देना कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप होगा और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ होगा।

    अदालत ने अपने आदेश में कहा,

    “सभी केंद्रीय मंत्रियों को रोज़ाना दो घंटे जनता से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत करने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है। इसके लिए कोई निर्देश जारी करने का औचित्य नहीं बनता।”

    अंत में अदालत ने कहा कि इस तरह के मुद्दों का समाधान संबंधित मंत्रालय या जनप्रतिनिधियों के स्तर पर होना चाहिए। इस मामले में कोई अनिवार्य आदेश (मैंडेमस) जारी नहीं किया जा सकता।

    इसी के साथ हाईकोर्ट ने याचिका को निराधार बताते हुए खारिज किया।

    Next Story